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Ajay Singla

Classics

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Ajay Singla

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खोजी

खोजी

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खोजी 


खोजी खोज रहा भगवान को 

जो भी मिलता, पूछे उसको 

क्या तूने भगवान को देखा 

देखने में कैसे दिखते वो ।


बहुत प्रसिद्ध हो गया वो खोजी 

“ नामी खोजी है” लोग कहते थे 

बस ईश्वर के ही परायण 

अपना सब कुछ लगा दिया इसीमें ।


खोजते खोजते उमर बीत गई 

पर भगवान का पता मिला ना 

एक दिन पहुँचा दूर गाँव में 

सिद्ध संत एक रहते थे वहाँ ।


जब उनसे भी प्रश्न किया यही 

प्रभु का पता मालूम है क्या 

संत बोले “ हाँ “ , मिल चुका मैं 

क्या तू भी उनसे मिलना चाहता ।


बता दिया पता भगवान का 

प्रसन्नता मुख पर थी खोजी के 

सोचे कि मेहनत सफल हो गई 

सरपट भागा भगवान से मिलने ।


पहुँच गया वो गंतव्य पर 

मंजिल जो ढूँढ रहा था कब से 

दस्तक दरवाज़े पर देने को 

सोचे, तभी आया उसके मन में ।


भगवान को मैंने पा ही लिया 

परंतु इसके बाद अब और क्या 

मैं तो सदा से एक खोजी हूँ 

बस यही अस्तित्व मेरा ।


जो भगवान से मिल लूँगा मैं 

ख़त्म हो जाए अस्तित्व ये 

धड़कन उसकी बड़ी तेज हुई 

जल्दी से भागा वो वहाँ से ।


खोजी खोजी ही रहना चाहता 

और खोज कर रहा जिसकी वो 

वो अगर मिल भी जाए उसे 

हो सकता वो ले ना उसको ।


खोज करे अब भी भगवान की 

ना जाने इधर उधर कहाँ, कहाँ 

पर जहाँ भगवान हैं रहते 

भूल से भी ना जाए वो वहाँ ।


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