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Ajay Singla

Classics


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Ajay Singla

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श्रीमद्भागवत-२३३ अरिष्टासुर का उद्धार और कंस का श्री अक्रूर जी को व्रज में भेजना

श्रीमद्भागवत-२३३ अरिष्टासुर का उद्धार और कंस का श्री अक्रूर जी को व्रज में भेजना

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श्री शुकदेवजी कहते, इक दिन जब

भगवान ने प्रवेश किया था व्रज में 

अरिष्टासुर नाम का दैत्य एक 

आया रूप बैल का धर के ।


अपने खुरों को पटके ज़ोर से 

धरती कांपने लगी थी उससे 

बड़े ज़ोर से गरज रहा वो 

खेतों की मेंड तोड़े सींगो से ।


भयंकर उस बैल को देखकर 

गोप, गोपियाँ भयभीत हो गए 

पशु इतने डर गए कि

भाग ही गए वो वहाँ से ।


ब्रजवासी कृष्ण की शरण में गए 

ढाँढस बँधाया कृष्ण ने उन्हें 

वृषासुर को फिर ललकारा था 

उसे क्रोधित करने के लिए ।


वृषासुर क्रोध से तिलमिला उठा 

झपटा श्री कृष्ण की और वो 

कृष्ण की और बड़े वेग से 

सींग आगे करके दौड़ा वो ।


भगवान कृष्ण ने दोनो हाथों से 

उसके दोनो सींग पकड़ लिए 

पीछे धकेलकर उसे गिरा दिया 

खड़ा हो झपटा उनपर वो फिर से ।


श्री कृष्ण ने लात मार कर 

गिरा दिया उसे, सींग पकड़ लिए 

पैरों से जब कुचला उसे तो 

प्राणों छोड़े थे बड़े कष्ट से उसने ।


अरिष्टासुर को जब मारा था कृष्ण ने 

नारद जी कंस के पास पहुँचे थे 

शीघ्र से शीघ्र दर्शन कराना चाहते थे 

दर्शन भगवान का लोगों को वे ।


इसलिए कंस से कहा उन्होंने 

कन्या तुम्हारे हाथ से जो 

छूटकर आकाश में गयी थी 

यशोदा की पुत्री थी वो ।


और कृष्ण व्रज में हैं जो 

पुत्र हैं वो देवकी के 

और बलराम जो उनके साथ हैं 

पुत्र हैं रोहिणी जी के वे ।


डरकर तुमसे वासुदेव ने तीनों को 

अपने मित्र नंद के पास में 

रख दिया था, और कृष्ण ने ही 

दैत्यों को मारा, जो अनुचर तुम्हारे ।


यह सुन कंस क्रोध से कांप उठा 

वासुदेव को मारने के लिए उसने 

तुरंत ही तलवार उठा ली 

परंतु नारद ने रोक दिया उसे ।


वासुदेव, देवकी को कंस ने 

डाल दिया जेल में फिर से 

नारद के चले जाने पर फिर 

केशी को बुलाया था कंस ने ।


कहा उसे, तुम व्रज में जाओ 

मार डालो बलराम, कृष्ण को 

उसके बाद बुलाया मुष्टिक

चानूर, शल, तोशल आदि को ।


इन पहलवानों, मंत्रियों, महावतों 

को बुलाकर तब कहा कंस ने 

वीरवार, चानूर और मुष्टिक

मेरी बात सुनो ध्यान से ।


बलराम, कृष्ण वासुदेव के पुत्र 

नंद के व्रज में रहते हैं वे 

मेरी मृत्यु बतलायी जाती 

है उन्ही दोनो के हाथ से ।


अतः जब वे मथुरा आएँ तो 

कुश्ती लड़ने लड़ाने के बहाने

तुम लोग तब मार डालना 

उन दोनो शत्रुओं को मेरे ।


अब तुम दंगल के लिए 

अखाडे बनाओ, मंच तैयार करो 

ताकि नगरवासी मथुरा के 

दंगल को सभी देख सकें वो ।


महावत, तुम दंगल के घेरे में 

फाटकपर कुवलीयापीड को रखना 

मेरे शत्रु उधर से निकलें तो 

हाथी से उन्हें मरवा देना ।


इसके बाद बुलाया कंस ने 

अक्रूर जी को और कहा उनसे 

बड़े उदार दानी आप हैं 

और आदरणीय आप मेरे ।


एक बड़े काम के लिए 

मैंने आश्रय लिया आपका 

नन्दबाबा के व्रज में जाईए

वासुदेव के दो पुत्र वहाँ ।


उन्हें कैसे भी यहाँ ले आईए

साथ में नंद और गोपों को भी 

मेरी मृत्यु का कारण निश्चित किया 

देवताओं ने उनके भरोसे ही ।


मरवा डालूँगा यहाँ आते ही 

कुवलीयापीड हाथी से उन्हें 

इससे वे बच भी गए तो 

मार डालें चानूर, मुष्टिक उन्हें ।


शोकाकुल होंगे उनके मरने पर 

वासुदेव और सारे बंधु उनके 

और मार डालूँगा मैं 

अपने हाथों से फिर उन्हें ।


मेरे पिता अग्रसेन और 

उनके भाई देवक हैं जो 

और जो उनका प्रिय करने वाले 

मार डालूँगा मैं उन सबको ।


अक्रूर जी फिर आप और मैं होंगे 

और अकंटक राज्य पृथ्वी का 

जरासंध मेरे ससुर हैं 

वानरराज द्विविद मेरे प्यारे सखा ।


शम्बरासुर, नरकासुर, बाणासुर 

मेरे मित्र हैं ही ये तो 

इन सब की सहायता से मैं 

मारकर देवपक्षि नरपतियों को ।


पृथ्वी का अकंटक राज्य भोगूँगा 

अभी बच्चे हैं, बलराम और कृष्ण तो 

उन दोनो को मारने में मुझको 

कोई भी कठिनाई ना हो ।


उन्हें केवल इतना कहिएगा 

कि धनुष्यज्ञ के दर्शन के लिए 

और मथुरा की शोभा देखने को 

वे लोग यहाँ आ जाएँ ।


अक्रूर कहें, महाराज आप तो 

अपनी मृत्यु दूर करना चाहते 

आपका सोचना ठीक ही है, पर 

फल मिलता नहीं केवल प्रयत्न से ।


दैवी प्रेरणा से मिलता फल 

बड़े बड़े मनोरथ मनुष्य करे 

परंतु यह वह नहीं जानता

नष्ट कर रखा ये पहले ही प्रारब्ध ने ।


यही कारण कि जब कभी प्रारब्ध के 

अनुकूल होने पर प्रयत्न सफल हो 

तो मनुष्य फूल जाए हर्ष से 

और प्रतिकूल होने पर शोकाकुल हो ।


फिर भी पालन करूँ आप की आज्ञा का 

ऐसा कहके अक्रूर चले गए 

और फिर विदा कर दिया 

बाक़ी मंत्रियों को भी कंस ने ।



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