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Ajay Singla

Classics


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Ajay Singla

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श्रीमद्भागवत -२३० ; महारास

श्रीमद्भागवत -२३० ; महारास

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श्री शुकदेव जी कहते हैं, राजन 

मधुर वाणी सुनकर कृष्ण की 

सफल मनोरथ हो गयीं गोपियाँ 

विरहजन्य ताप से मुक्त हो गयीं।


एक दुसरे के बाहँ में बाहँ डाले 

खड़ीं थीं वो कृष्ण के साथ में 

उन स्त्री रत्नों के साथ फिर 

रासक्रीड़ा प्रारम्भ की कृष्ण ने।


सम्पूर्ण योगों के स्वामी कृष्ण 

प्रकट हुए उनके बीच में 

दो गोपियों के बीच में एक कृष्ण 

हाथ डाले गले में उनके।


एक गोपी, एक कृष्ण ये क्रम था 

अनुभव कर रहीं सभी गोपियाँ ये 

कि हमारे कृष्ण हमारे ही साथ हैं 

रासोत्सव प्रारम्भ किया उन्होंने।


अपनी पत्नियों के साथ देवता 

आकाश में वहां आ पहुंचे 

रासोत्सव के दर्शन की लालसा से 

उनके मन वश में नहीं थे।


सवर्गीय पुष्पों की वर्षा होने लगी 

गन्धर्व कृष्ण का गान करने लगे 

प्रियतम के साथ नृत्य करने लगीं 

सभी गोपियाँ रासमंडल में।


उनकी कलायिओं के कंगन और 

पायजेब पैरों की उनकी 

छोटे घुंघरू वो करधनी के 

बज उठे एक साथ ही।


रमणरेती पर यमुना की 

कृष्ण, वृजसुंदरियों के बीच में 

शोभायमान हो रहे जैसे 

नीलमणि चमक रही स्वर्ण मणियों में।


परम प्रेयसी गोपियाँ कृष्ण की 

साथ गा गा कर नाच रहीं 

बहुत से कृष्ण मेघ समान लगें 

बीच में गोरी गोपियाँ बिजली सी।


उन सब की शोभा असीम थी 

भगवान का प्रेम जीवन गोपियों का 

आनंदित हो रहीं थीं वो 

पाकर संस्पर्श कृष्ण का।


उनके राग रागनियों के गान से 

जगत सारा गूँज रहा था 

नृत्य करते थक गयी एक गोपी 

कृष्ण ने कंधे से पकड़ लिया।


दूसरी गोपी के कंधे पर 

भगवान ने अपना हाथ रखा था 

उसमें लगे चन्दन की सुगंध से 

पुलकित हो उसने उसे चूम लिया।


परीक्षित, सौभाग्य गोपियों का 

बढ़कर है लक्ष्मीजी से भी 

प्रियतम के रूप में पाकर कृष्ण को 

गोपियाँ उनसे विहार करने लगीं।


श्री कृष्ण ने उनके गलों को 

बाँध रखा भुजपाश में अपने 

कानों में उनके कमल के कुंडल 

कपोलों पर लटकीं घुंघराली अलकें।


पसीने की बूँदें छलकने से 

छटा निराली हो रही मुख की 

चोटियों के फूल गिरते जा रहे 

कंगन और पाएजेब बज रही ।


कृष्ण कभी हृदय से लगाएँ 

कभी अंग स्पर्श उनका करें

प्रेम भरी चितवन से देखें कभी 

क्रीड़ा विहार करें संग उनके ।


इन्द्रियप्रेम, आनंद से विह्वल हुईं 

भगवान का स्पर्श पाकर गोपियाँ 

केश बिखर गए, फूल टूट गए 

वस्त्रों का भी ध्यान ना रहा ।


रासलीला देख कृष्ण की 

देवांगनाएँ भी मोहित हो गयीं 

समस्त तारे और ग्रहों के साथ में 

विस्मित हुए थे चन्द्रमा भी।


गोपियाँ थक गयीं तो कृष्ण ने 

करकमलों से उनके मुख पोंछे 

यमुना के जल में प्रवेश किया तब 

जल क्रीड़ा करने के लिए।


जल उलीच उलीचकर कृष्ण पर 

खूब बौछारें की, नहलाया उन्हें 

देवताओं ने पुष्प वर्षा की, और फिर 

कृष्ण गोपियाँ उपवन में आ गए।


यमुना तट का उपवन वो रमणीय 

परीक्षित, रात्रि वो शरद की 

बहुत ही सुंदर थी और 

चांदनी वहां छिटक रही थी।


भगवान तो सत्य संकल्प हैं 

चिन्मयी लीला है ये क्रीड़ा उनकी 

अपने आप में कैद कर रखा उन्होंने 

चेष्टाओं को, कामनाओं की।


राजा परीक्षित ने पूछा भगवन 

कृष्ण एकमात्र स्वामी जगत के 

धर्म की स्थापना और 

अधर्म का नाश वो करते।


धर्म मर्यादा को बनाने वाले 

उपदेश करने वाले, रक्षक वे 

फिर पर स्त्रियों का स्पर्श कैसे किया 

धर्म के विपरीत उन्होंने।


भगवान तो पूर्ण काम हैं 

किसी भी वस्तु की कामना न उन्हें 

फिर यह निंदनीय कर्म क्यों किया 

आप मेरा ये संदेह मिटाइये।


श्री शुकदेव जी कहते हैं, परीक्षित 

सूर्य, अग्नि आदि समर्थ ईश्वर जो 

धर्म, मर्यादा का उलंघन करते 

कभी कभी देखे जाते वो।


परन्तु उन तेजस्वी पुरुषों का 

उन कामों में कोई दोष न हो

पदार्थों के दोष से लिप्त न होते 

जिन पदार्थों को खा जाते वो।


जिन लोगों में ऐसी सामर्थ्य नहीं 

करना चाहिए उन्हें ऐसा नहीं 

करना तो दूर की बात है 

सोचे न कभी ऐसा मन में भी।


यदि मूर्खतावश ऐसा कर बैठे 

नाश उसका हो जाता इससे 

शंकर ने हलाहल विष पी लिया 

भस्म हो जाये जो और कोई पी ले।


इसलिए शंकर आदि ईश्वरों के 

वचनों को सत्य माने मनुष्य ये 

आचरण जो उनके उपदेशों के अनुकूल हो 

पुरुष को वो ही करना चाहिए।


परीक्षित, सामर्थ्यवान पुरुष जो 

अहंकार रहित होते और उनको 

स्वार्थ न हो शुभ कर्म करने में 

न अशुभ करने में कोई अनर्थ हो।


वे स्वार्थ, अनर्थ से ऊपर उठे होते 

शुभ, अशुभ से सम्बन्ध न भगवान का 

वे तो बस लीला करें, उनमें 

कैसे हो कर्मबन्धन की कल्पना।


मनुष्य रूप में प्रकट होकर

ऐसी लीला करते रहते वे 

भगवान के परायण हो जाएं 

जिसे सुनकर जीव संसार के।


ब्रजवासी गोपों ने भगवान कृष्ण में 

तनिक भी दोषबुद्धि नहीं की 

योगमाया से मोहित हो समझ रहे 

हमारी पत्नियां हमारे पास ही।


रात्रि बीती, ब्रह्म मुहूर्त आया 

गोपियों की इच्छा ना जाने की 

फिर भी भगवान की आज्ञा से वो 

अपने अपने घर चली गयीं।


रस रास शब्द का मूल है 

भगवान कृष्ण स्वयं ही रस हैं 

एक रस में अनेक रसों का समास्वादन 

जिस लीला में, उसे रास कहते हैं।


भगवान की दिव्य लीला ले 

दिव्य धाम में भगवान के 

निरंतर हुआ करती है 

इसी दिव्य रूप में ये।


प्रिय साधकों का भगवान् के 

हित्तार्थ करने के लिए 

कभी कभी भूमण्डल में भी होती 

भगवान की विशेष कृपा से।


जिसको देख, सुन और गाकर

तथा स्मरण चिंतन करके सभी 

इस परम रसमयी लीला का 

आनंद लें और स्वयं भी।


 भगवान की लीला में सम्मिलित होकर 

अपने को कृत कृत्य कर सकें 

समझ में आए भगवत कृपा से 

और मनुष्य अन्त दृष्टि से।


भगवत्कृपा प्राप्त महात्मा 

जिन्होंने इसका अनुभव किया है 

धन्य हैं और चरणधूलि से उनकी 

ये त्रिलोकी भी धन्य है।


परम रसमयी और सचिदानंदमयी है 

गोपियाँ भी कृष्ण के समान ही 

जड़ शरीर तो त्यागा ही उन्होंने 

त्याग दिया स्वर्ग, मोक्ष आदि भी।


चिदानन्दस्वरूप श्री कृष्ण ही हैं 

बस केवल उनकी दृष्टि में 

तृप्त करने वाला जो कृष्ण को 

प्रेमामृत है उनके ह्रदय में।


गोपियों को पहचाना है जिन्होंने 

चरणधूलि का गोपियों की 

स्पर्श प्राप्त करके उन्होंने 

कृत्य कृत्यता चाही है अपनी।


ब्रह्मा, शंकर, उद्धव, अर्जुन ने 

गोपियों की उपासना करके 

वैसे ही प्रेम का वरदान प्राप्त किया 

भगवान् के चरणकमलों में।


प्राकृत देह का निर्माण होता है 

स्थूल, सूक्षम और कारण, तीनों देहों से 

जब तक कारण शरीर रहे, जीव को 

प्राकृत देह से छुटकारा न मिले।


कारण शरीर, पूर्व कर्म और 

संस्कार कारण हों देह निर्माण के 

कारण शरीर के अधार पर ही वो 

चक्र में पड़ता जन्म मृत्यु के।


इसी कर्मबन्धन के कारण 

पंचभौतिक स्थूल शरीर है मिलता 

रक्त, मास, अस्थि आदि से बना 

और चमड़े से ढका ये होता।


प्रकृति के राज्य में जितने शरीर हैं 

योनि और बिंदु के संयोग से बने 

चाहे वो मैथुन से बने हों 

या बने हों वे संकल्प से।


ये सब प्राकृत शरीर हैं 

प्राकृत है पितरों, देवों का शरीर भी 

अप्राकृत शरीर विलक्षण होते हैं 

प्रलय में भी नष्ट होते नहीं।


देव शरीर प्रायः बने नहीं होते 

रक्त, मास, मेद, अस्थि से 

तो कृष्ण का भगवत्स्वरूप शरीर फिर 

इन सबसे बना हो कैसे।


वह तो सर्वथा चिदानंदमय है 

पूर्ण कृष्ण एक एक अंग उनका 

श्री कृष्ण का सब कुछ पूर्ण श्री कृष्ण 

इसी लिए वह पूर्णतय सर्वथा।


उनमें यह चमत्कार कि स्वयं ही 

अपने को ही आकर्षित कर लें वे 

फिर उस सौंदर्य माधुर्य से पुलकित हों 

गौ, हरिण तो कहना ही क्या।


कृष्ण का शरीर न तो कर्मजन्य है 

न बना मैथुनी सृष्टि से, न दैवी ये 

सर्वथा विशुद्ध भगवत्स्वरूप है 

वह तो इन सब से परे।


उसमें रक्त, मास आदि नहीं 

अतएव : उसमें शुक्र भी नहीं 

स्त्री पुरुष के रमन, मैथुन की 

कल्पना भी उसमें नहीं हो सकती।


भगवान इसलिए उपनिषदों में 

कहलाये अखंड ब्रह्मचारी 

इसलिए रमन जो गोपियों के संग किया 

दिव्य लीला है, लौकिक लीला नहीं।


दिव्य रास जो ये नाम है 

श्री कृष्ण की रसमयी क्रीड़ा का 

इसमें न कोई जड़ शरीर था 

न प्राकृत अंग भांग था।


पोषक वियोग ही संयोग का 

मान और मद बाधक लीला में 

और भी पुष्टि हो रास की लीला में 

भगवान की लीला में इसलिए होते वे।


मान और मद का संचार हुआ 

भगवान की इच्छा से गोपियों में 

और इसके बाद वहां से 

भगवान अंतर्धान हो गए।


लेश मात्र भी मान और मद 

शेष है जिनके हृदय में 

वे सब अधिकारी नहीं हैं 

भगवन के सन्मुख रहने के।


परन्तु गोपियाँ तो गोपियाँ थीं 

किसी प्राणी की तुलना उनसे सम्भव नहीं 

भगवान के वियोग में 

गोपियों की जो दशा हुई।


उससे उनके शरीर, मन, प्राण जो 

कृष्ण में एकतान हो गए 

गोपियों की प्रेम भावना देखकर 

कृष्ण आनंदित हो बोले उन्हें।


‘ तुम्हारे प्रेम का चिर ऋणी हूँ 

और ऋणी मैं रहूंगा सदा ‘

रासलीला के सम्बन्ध में 

कई ज्ञानियों ने अलग अलग कहा।


किसी ने इसी काम पर विजय बताया 

कोई कहे दिव्य विहार भगवान का 

किसी ने आध्यात्मिक कर्म कहा 

ये लौकिक स्त्री पुरुष का मिलन नहीं था।


भगवान का एक मात्र धर्म है 

प्रेमपरवशत, दयापरवशता

भक्तों की अभिलाषा की पूर्ती 

लीलाओं में यही है किया।


यशोदा के हाथों ऊखल से बंध गए 

और प्रेम में गोपियों के 

उनके साथ नाचे और गाए

उनका है सहज धर्म ये।







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