शीर्षक - हमारा मकान
शीर्षक - हमारा मकान
शीर्षक - हमारा मकान
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हमारा मकान हम सजाते हैं।
जीवन के सच साथ निभाते हैं।
जिंदगी के सफर में सोचते हैं।
बच्चों के साथ बूढ़े हो जाते हैं।
नीरज शब्दों में बस लिखते हैं।
जागरूकता और सच कहते हैंं।
हमारा मकान माता पिता देते हैं।
सोचे हमारा मकान परिवार होता हैं।
बुढ़ापे में माता पिता आश्रम में होते हैं।
हमारा मकान बस यही जिंदगी कहता हैं।
आधुनिक समय में सच हम समझते हैं।
प्रेम चाहत और हालात हम रखते हैंं।
आओ सोचे हमारा मकान बनाते हैं।
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नीरज कुमार अग्रवाल (लेखक) चंदौसी उत्तर प्रदेश
प्रमाणित किया जाता है कि यह रचना स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसका सर्वाधिकार कवि/कलमकार के पास सुरक्षित है।
