शीर्षक - घुटन ..... मन मंथन
शीर्षक - घुटन ..... मन मंथन
शीर्षक - घुटन..... मन मंथन
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सच तो हमारे मन की घुटन हैं।
शारीरिक मानसिक रहतीं हैं।
घुटन ही तो हम सब के साथ हैं।
परिवार दायित्व सब सहने हमें हैं।
नर नारी में आज भी भेदभाव हैं।
आधुनिक हम तुम आज भी कहां हैं।
घुटन रोज हम तुम तनाव के साथ हैं।
एक छत और हालात न हम कहते हैंं।
नीरज शब्दों घुटन एक मन लिखते हैं।
हम सब दिखावा फरेब स्वार्थ रखते हैं।
घुटन ही तो हमारे मन भाव सब कहतीं हैं।
शरीर और आत्मा स्वयं और स्वार्थ होते हैं।
घुटन महसूस हम सभी को मन में होती हैं।
हमारी इच्छाएं और महत्वाकांक्षाएं होती हैं।
हम तुम सात फेरे लेकर खुश जीवन जीते हैं।
सच तो और भी हमारी सोच और जिंदगी हैं।
समझौता हम तुम घुटन के साथ भी करते हैं।
सच और हकीकत में हम सभी कहां सोचते हैं।
मन और शरीर सोच हमारी स्वतंत्रता चाहतीं हैं।
आओ मिलकर घुटन की राह को पर बोलते हैं।
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नीरज कुमार अग्रवाल चंदौसी उत्तर प्रदेश
