सौंदर्य
सौंदर्य
मैं अक्षर बिखरा तीतर बितर बेमतलब सा, तू शब्दों में मोती सा पिरोया गीत-हार मेरा,
मैं रेगिस्तान तेज ताप में झुलसता सूखा सा, तू झोंका समीर का नखलिस्तान मरुद्यान मेरा,
मैं बेताल कर्कश गला शोर सा, तू आवाज़ सुर, लय-ताल मेरी,
मैं अलफ़ाज़ कहता आशिक़ तेरा, तू जज़्बात बयान करती, जतलाती समझ मेरी,
मैं शीशे का कमरा पारदर्शी निर्मल सा, तू शर्म -लाज इज़्ज़त -प्रतिष्ठा पर्दे की आड़ में मेरी,
मैं बीज से पनपे पौधे के फूटते अंकुर सा, तू फल मेहनत अथक परिश्रम का का मेरी,
मैं बेढंगा बदसूरत ठूंठ खड़ा तिरछा सा, तू लता वल्लरी चारों और मेरे,
मैं सड़क ऊबड़ खाबड़ सी, तू पगडण्डी जीवन की मंज़िल मेरी,
मैं कारावासी कैदी काला-पानी का, तू पक्षी वृंद खुले आसमान में मेरा,
मैं शीत में काँपता -ठिठुरता कुहासा, तू हरी खिली दूब पर सजी ओस की बूँद मेरी,
मैं चिलचिलाती धूप मैं संघर्ष खड़ा पेड़ की शाखा सा, तू समीर टहनी पर इठलाती लहराती पत्ती मेरी,
मैं माटी मटमैली धूल मैं लिप्त सा, तू कुम्भ सारंग अमृत भरी जीवन-मेला मेरी,
मैं शिथिल कमजोर हारा जंतु क्षुधा पिपासा, तू दाना धान, प्याला पानी का मेरी,
मैं लोहे की पटरी पर दौड़ती रेलगाड़ी सा, तू ईंधन चाबी रफ़्तार मेरी,
मैं नभ नीला श्याम-स्याह मेघ से घिरा, तू गुरूर -गौरव मेरा, चार चाँद ललाट पे मेरे,
मैं संघर्ष समर उत्तुंग तंग कटीले दुष्कर दुर्बोध अचल गिरी सा, तू साहस सुबोध लहराता ध्वजा शिखर पर मेरा,
मैं ईंट-भट्टा, रोड़ी -बजरी सीमेंट-चूना तेरा, तू निकेतन आशियाँ ठिकाना धाम-चार मेरा,
मैं इमारत गगन -चुम्बी सा, तू भू में निहित नींव, बोझ-वाहक, उठाये भार आभार मेरी,
मैं बेचैन -परेशान भटकता मुसाफिर यहां -वहां सा, तू सुकून, अमन मृगतृष्णा क्षितिज में मेरी।
