रंग बसंती छा गया..!
रंग बसंती छा गया..!
रंग बसंती अंग बसंती छा गया
मस्ताना मौसम आ गया।
तुम्हें बहुत पसन्द था ना यह गीत
जब भी ऋतु बसंत आता
तुम रंग जाते थे उसके रंग में
प्रकृति के सभी रंग को
आत्मसात कर लेते स्वयं में
यह कह करके कि प्रेमोत्सव है बसंत
ऐसा लगता सारी बहार उस खिड़की से
तुम्हारे कोठी में कूद पड़ी हो।
जो भी मिलता उसे भी बसंती कर देते
सारे उपहार भी प्रकृति के सौंदर्य से
ओतप्रोत होते थे तुम्हारे
उस पर तुम्हारी वो फर्माइश
पीली साड़ी ही पहनकर मिलूँ
वो भी हरी भरी बेल बूटों वाली
जब भी मिलने आऊँ तुमसे
रजनीगंधा की सुगंध हो संग।
चेहरे पर मायूसी कहाँ पसन्द था तुम्हें
गालों पे गुलाब सी रंगत
आधार भी पंखुड़ी सी रक्ताभ लिये
खिलखिलाते हुए देखना चाहते हमेशा।
ओह..!
तुम क्या गये
अब तो कुछ भी सुहाना नहीं लगता
ना ये किराये का तन ना अपना मन
बसंत भी आकर बैरंग लौट जाता है
तुम होते तो सब अच्छा होता
फिर भी मैं इंतज़ार करती हूँ
तुम्हारे और बसंत के आने का
बसंत तो हर बार आता है
पर, वो भी तुम्हें तलाश कर लौट जाता है
तुम बिन सुना है हर रंग फिर कैसा हो बसंत..

