रिश्तों के तीन रंग
रिश्तों के तीन रंग
पहला रंग — पहली मुलाक़ात की सुनहरी सुबह
वो पहली मुलाक़ात, जैसे कोई डिजिटल डेब्यू,
हर संदेश में घुली थी मीठी मनुहार,
आकर्षण और उत्सुकता से भरी, जैसे नैनो तकनीक की चमक।
आँखों में भविष्य के सपनों का आभास, होंठों पर संक्रामक हँसी,
हर पल जैसे कोई वायरल लम्हा, दिल में बजी अनसुनी धुन नई।
न कोई उलझन, न कोई शिकवा-शिकायत,
सब कुछ सहजता से बहता था, जैसे कोई मधुर तराना।
उनके हर अंदाज़ में एक मोहक संगीत था,
और ये दिल, मानो सावन में भीगता, एकदम आज़ाद।
दूसरा रंग — टकराहट का धूप-छाँव का दौर
फिर आया जीवन की सच्चाई का पल, थोड़ा खरा, थोड़ा कठोर,
जब आदतें टकराईं, और चुप्पी ने भी कह दीं कई अनकही बातें।
छोटी-छोटी बातों में सवाल उठने लगे, जैसे क्या है भीतरी कहानी?
और हँसी के बीच अनजाने घाव भरने लगे धीरे-धीरे।
कभी वो मौन रहे, कभी हम अनमने,
कभी ग़लतफ़हमियाँ बनीं एक अटूट सिलसिला।
यही वो मोड़ था जहाँ कई दिल हार मान लेते हैं,
पर जो साथ निभाते हैं, वही बनते हैं रिश्ते की सच्ची पहचान।
जैसे जीन संपादन में बदलाव लाने की कोशिश,
हमने अपने भीतर की जटिलताओं को समझा,
और एक नई पहचान बनाई, जो हमें जोड़ती है।
तीसरा रंग — अपनत्व की गहरी परत
और फिर आया वो मुकाम, जहाँ प्रेम ने सत्य का हाथ थामा,
जहाँ कमियों में भी दिखी सुंदरता, हर एहसास हुआ अनमोल।
अब शिकायतें नहीं, समझदारी की होती है चर्चा,
अब बहस नहीं, सुकून की होती है अनुभूति हर पल।
हमने उन्हें वैसे ही स्वीकारा जैसे वे हैं, बिना किसी बनावट के,
न बदलने की चाह, न सुधारने का कोई आग्रह।
अब प्रेम केवल एक भावना नहीं,
बल्कि एक शांत, गहरा और संपूर्ण समर्पण बन गया है।
जैसे क्वांटम फिजिक्स में हर कण का अपना स्थान है,
वैसे ही हमारे रिश्ते में हर भावना का एक अद्वितीय महत्व है।
इस तरह, रिश्तों के ये तीन रंग,
एक आधुनिक फलक पर बुनते हैं एक नई कहानी,
जहाँ प्रेम, संघर्ष और अपनत्व,
सभी मिलकर बनाते हैं जीवन की एक अद्भुत धुन।

