रात का दर्पण
रात का दर्पण
चंचल चांदनी है,महकी रात है,
जगमगाते तारे हैं।
सफेद आसमान यूं देख रहें हैं,
जैसे उनके निगाहें मुझे देख रहें हों।
आलम यह कैसा अद्भुत है,
विरांगी की छाती चीर,
अमृत नीर बहा रही हो।
रात का दर्पण में,
मैं देख रहा हूं।
तमाम अकाश_गंगा,
अपनी मधुर तान दे रही हो।
सारे नजारे दृष्टिगोचर हो रहें हैं,
दर्पण यह कैसा गजब है।
हृदयतल के सारे तार,
झंझकृत हो रहें हैं।
आज समा गज़ब है,
धरा की नींद कहीं खो गई है।
रात का दर्पण में,
तमाम उन्माद निकल रहें हैं।
