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Madhu Vashishta

Tragedy

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Madhu Vashishta

Tragedy

प्यास बुझती कहां है?

प्यास बुझती कहां है?

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पल में उदासी तो खुशी भी पल में आ जाती है।

सोच बदलो तो दुनिया ही बदल जाती है।

हर जन्म दिवस पर घटता है एक साल मगर,

जिंदगी सही सलामत बीतने की खुशी तो हर साल जश्न में ही बदल जाती है।

यूं ही बीतते जाते हैं साल दर साल।

यूं ही बदलते रहते हैं ख्याल दर ख्याल।

शरीर जवान होता है और फिर एक दिन कमजोर भी हो जाता है।

बच्चों का बचपन भी जवानी में बदल जाता है।

अनुभवों की गठरी भी होती है भारी दिन पर दिन।

जिंदगी तो बीत जाती है लेकिन काम पूरे कहां निपट पाते हैं।

हर दुनिया से जाने वाले के साथ हम कहां जा पाते हैं?

आने वाले नए बच्चों के साथ हम कहां जी पाते हैं?

सपने अक्सर अधूरे के अधूरे ही रह जाते हैं।

पुराने सपने पूरे हो भी गए हो तो नए सपने जग जाते हैं।

ईर्ष्या द्वेष लोभ मोह अहंकार यूं ही तड़पाते हैं।

जिंदगी बीतती रहती है लेकिन इच्छाएं खत्म होती ही कहां है?

चाहे कितना भी लंबा हो जीवन और कितनी भी पूरी हो आस लेकिन,

जीवन को जीने की प्यास बुझती ही कहां है?


   



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