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Madhu Vashishta

Tragedy Inspirational

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Madhu Vashishta

Tragedy Inspirational

प्रलयंकारी बरसात

प्रलयंकारी बरसात

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हो रही है हो हो रही है प्रलयंकारी बरसात

ए मानव अब क्यों करें तू अवसाद।

पेड़ों को जब काट रहा था।

कंक्रीट के जंगल उगा रहा था,

तब क्यों ना सोची यह बात?

कुछ जगह समुद्र को भी चाहिए,

नदिया ने भी बहना है,

मानव यह तेरी कैसी विकास यात्रा

कि तुझको तटों पर भी रहना है।

धरती पर पशुओं और पक्षियों का भी हक है।

काट लिए जंगल भी सोचता क्या अब है?

क्या जानता नहीं मानव कितने पशु पक्षी हो रहे लुप्त हैं।

खत्म होते जंगल, टूटते ग्लेशियर,

मानव अब भी तेरा ध्यान है किधर?

पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना बंद कर,

मत भूल प्रकृति है सबल और आज भी तू है प्रकृति पर ही निर्भर।

प्रकृति ने दिखा दिया ना तुम्हें तुम्हारी औकात।

देख रहे हो ना प्रलयंकारी बरसात।



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