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Rajeev Rawat

Tragedy Inspirational

4  

Rajeev Rawat

Tragedy Inspirational

प्रकृति--दो शब्द

प्रकृति--दो शब्द

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मैंने पूछा प्रश्न तुम कौन हो? 

सामने खड़े हुए हरे भरे वृक्ष से--

एकटक घूरता रहा मुझे मौन हो दो पल, 

और दो बूंदें आंसूं टपका गया अपने वक्ष से--

मैं खुद अपने अस्तित्व को खोज रहा हूं बरसों से, 

कभी बनता हूँ किसी के प्रेम मिलन केंद्र, 

कभी छाया, कभी गरीब के रोटी का सहारा--

और कभी फूलों और फलों का वाहक बनता हूं

तो कभी मानवों के अत्याचार सहता बेचारा--

सोखता हूं मानवों के दुर्गुणों को, 

और देता हूं उनको जीने के लिए शुद्ध हवा--

कभी चूल्हे की लकड़ी बनता हूँ, 

कभी दरवाजा, कभी फर्नीचर और कभी दवा--

फिर मैं सही सलामत और जिंदा हूं कब तक

यह भी शायद तेरी है दया--

अब मैं कौन हूं और क्या हूं, तू ही बता-? 


मैंने सामने स्थित 

विशाल पर्वत से यही प्रश्न दोहराया - - 

वह उत्तर में कुछ रेत, कुछ पत्थरों के साथ अचानक भरभराया--

रे मानव, तू काग से अचानक बनता क्यों हंस है--

जरा गौर से देख मेरा क्षत विक्षिप्त सीना, जर जर होती अस्थियां,

ढहती पेड़ो की जड़ें, चारों ओर तेरी विकृति और विध्वंस है--

मैं हवाओं के तेज बवंडर को अपने मजबूत हृदय पर झेलता--

बादलों से टकराकर पानी की बूंदों को झरने बना कर

तुम्हारे कूपों, तालाबों और खेतों में भेजता-

न जाने कब से तुम्हें अपना मान कर यह सब झेल रहा था--

हमें क्या पता था कि हमारा प्रारब्ध तुम्हारे लालच,

गगन चुंबी इमारतों की जुगुप्सा में अनाड़ी इंसानों के हाथों खेल रहा था--

पता नहीं अपने आप को नष्ट करने का तुम मानवों न जाने कौन सा कोण हूं--

अब तू ही पता मैं कौन हूं -? 


बहती नदी की धार से, 

मैंने पूछा प्यार से, तुम कौन हो? 

वह लहराती तरंगों से तिरछा मुंह बनाकर बोली, 

तुम सब देखते जानते पूछते हो प्रश्नों को

पत्रकार के जैसे--

सैलाब में डूबते आदमी के मुंह में माइक लगाकर कहते हो, 

ओ भाई डूबते हुए लगते हो कैसे--

मैं जब चंचल होकर प्रेम के आवेग में मिलने अपनी प्रियतम से, आशा और अरमान लिए जाती हूं--

तुम मानवों द्वारा कंक्रीट के बांध बना कर एक दायरे में बांध दी जाती हूं--

मैं अब मैं कहां रह जाती हूं, 

तुम्हारे द्वारा छोटी धाराओं में बांट दी जाती हूं--

इसलिए जब मैं और मेरा दम घुटता है, 

तब या तो सैलाब वन कर या रेगिस्तान बना कर अपना विरोध जताती हूं--

सच कहूं,

अब मैं तुम्हारे अतिक्रमण से ग्रसित एक अभिशप्त दृष्टिकोण हूं--

रे दुष्ट मानव अब तू ही बता मैं कौन हूं--? 


जो प्रकृति, 

हमारे जीवन का आधार है-

जिसके बिना जीवन बेकार है-

फिर भी हम कंक्रीट के फैला रहे है जाल-

प्रकृति को कर रहे बेहाल - 

और अनजाने दे रहे दावत-ए-आकाल-

इसलिये अभी भी समय है संभल जाइये-

वरना विनाश के लिए तैयार हो जाइये

       


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