“पापा… एक बार”
“पापा… एक बार”
“पापा… एक बार”
पापा… एक बार आ जाओ ना,
बस एक बार बात कर लो ना…
मैं वही हूँ, आपकी बेटी,
जो हर बात आपसे कहती थी ना…
आज भी बहुत कुछ कहना है,
पर सुनने वाला कोई नहीं है,
भीड़ तो बहुत है आसपास,
पर अपना कोई नहीं है…
जब भी डर लग जाता है,
आपकी याद आ जाती है,
सोचती हूँ अगर आप होते,
तो ये दुनिया आसान हो जाती…
मैं मजबूत बनती जा रही हूँ,
सब कहते हैं “बहुत हिम्मती है”,
पर कोई ये नहीं जानता—
ये हिम्मत भी आपकी कमी से ही आई है…
पापा, देख रहे हो ना मुझे?
मैं सच में कोशिश कर रही हूँ…
टूटती हूँ हर रात,
फिर भी सुबह खुद को जोड़ रही हूँ…
आप नहीं हो, ये मान लिया है,
पर दिल मानता ही नहीं…
क्योंकि हर खुशी, हर दर्द में,
सबसे पहले याद आप ही आते हो…
