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Priya Silak

Abstract Tragedy Inspirational

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Priya Silak

Abstract Tragedy Inspirational

“टूटकर भी”

“टूटकर भी”

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🌙 “टूटकर भी”
सब कहते हैं, मैं मजबूत हूँ,
पर कोई ये नहीं पूछता—
कितनी बार टूटी हूँ मैं…
हर बार संभाल लिया खुद को,
हर बार मुस्कुरा दी मैं,
पर अंदर कहीं
हर रोज़ बिखरती रही मैं…
किसी ने सहारा नहीं दिया,
तो खुद ही सहारा बन गई,
दर्द इतना मिला कि
मैं खुद ही दवा बन गई…
अब फर्क नहीं पड़ता,
कौन साथ है, कौन नहीं,
मैंने सीख लिया है—
अकेले ही चलना सही…
पर कभी-कभी दिल कहता है,
थोड़ा रुक जाऊँ, थोड़ा रो लूँ…
किसी के कंधे पर सिर रखकर,
बस एक बार… जी भर के सो लूँ…


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