नियति
नियति
पेड़ बस खड़ा है।
जैसे हमेशा से खड़ा था —
जड़ों में धँसा, आसमान की ओर फैला,
पर भीतर से बिल्कुल स्थिर।
पंछी उड़ गया है।
और पेड़ उसे दोष भी नहीं दे सकता।
उड़ान उसका स्वभाव है,
आसमान उसका घर।
पेड़ को तो बस उसकी खुशियों में ही खुश होना है।
यही उसका धर्म है।
उसकी नियति उड़ना नहीं,
यादों को समेटना है।
गिरते हुए पंखों की आहट,
टहनी पर छोड़ी हुई हल्की-सी गर्माहट,
सुबह की पहली चहक —
सब कुछ बटोर कर चुपचाप रख लेना।
उसे शिकायत का भी अधिकार नहीं।
उसे बस मौन रहना है,
क्षितिज की ओर तकते रहना है।
उसे उम्मीद भी नहीं कि पंछी लौटेगा।
फिर भी…
हर बार जब हवा पत्तों को छूती है,
धड़कन एक पल को ठहर जाती है —
शायद वही हो।
पेड़ जानता है,
उड़ानें लौटने के लिए नहीं होतीं।
फिर भी,
हर सरसराहट में
वह उसी को खोजता है।
और खड़ा रहता है।
बस खड़ा।
