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कीर्ति त्यागी

Tragedy

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कीर्ति त्यागी

Tragedy

नहीं है अधिकार,,

नहीं है अधिकार,,

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नहीं है अधिकार मुझे छूने का कि मैं कोई सौगात नहीं ,

कुदरत की बनाई अनमोल कृति हूं कोई व्यापार नहीं,


नहीं है अधिकार कि मुझ तक तुम्हारी पहुंच हो मैं कोई सामान नहीं ,

कुदरत ने गढ़ा है मुझको तुम मुझे पा सको तुम्हारी कोई औकात नहीं,,


नहीं है अधिकार कि जिस्म की आग मैं ठंडी करूं मैं कोई भोगने का सामान नहीं ,

कुदरत ने अनमोल एहसास दिए हैं जिन्हें तुम्हें पाने का अधिकार नहीं,


नहीं है अधिकार कि मुझे मां कह सको नारी का सम्मान न करें जो वो इंसान नहीं ,

कुदरत ने दिया है मां का दर्जा पर तुम जैसी औलाद नहीं,


गर्व है मुझे कि कुदरत ने औरत बनाया है मुझे तुम जैसा मर्द नहीं ,

गर नोचते हो औरत को तो तुम्हें मर्द कहलाने का अधिकार नहीं,


अधिकार क्यों नहीं है मुझे कि पंखों की उड़ान भरूं क्या मुझे उड़ने का अधिकार नहीं,

कुदरत ने तो तराशा है मुझे भी फिर क्यों मेरे लिए आसमां नहीं,


कभी कभी सोचती हूं क्या मेरे अंदर एहसास नहीं ,

क्यों कुचले गए मेरे ही जज़्बात या कुदरत ने तुम्हें प्यार से नवाजा ही नहीं,,


महफ़िल अक्सर ही सजती है गुलशन में पर क्या एक फूल पर मेरा अधिकार नहीं,

कुदरत ने तो सबको खुशबू दीं है फिर उन फूलों के कांटों पर भी क्या मेरा थोड़ा भी अधिकार नहीं,


आज मैं सोचने पर विवश हूं कैसी ये दुनिया है जहां नारी का सम्मान नहीं ,

कुदरत ने बनाया है जिसे पर ये दुनिया हमेशा उससे अंजान रही,


दे सको तो थोड़ा अधिकार मुझे भी दो क्या मेरी आह का तुम्हें बिल्कुल भी डर नहीं ,

मैं वो अबला नारी नहीं कि बिस्तर तक सिमट जाऊ अब ये मेरी पहचान नहीं,


हर उड़ान भरी है मैंने इससे ये जगत अंजान नहीं ,

पर जो सम्मान न करे मेरा उसके लिए अब कोई सम्मान नहीं,


हां नहीं है अधिकार तुम्हें कि मुझे छू सको,



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