नहा रही है चिड़िया
नहा रही है चिड़िया
चिड़िया नहा रही है
धूल धुसरित बदन को
मलमल कर सहला रही है।
माँ-माँ की आवाज़ें लगा रही है
माँ आंटे से सने हाथों से
बदहवास सी दौड़ी आई।
क्या हुआ--
मेरी नन्ही परी--
तुम्हारे मुख पर
क्यों इतनी पीड़ा
उभर आई है---?
मौसम है बसंत बहार
नहीं कहीं भी धूल-मिट्टी,
आँधी का गुबार--
तुम्हारे बदन पर
इतनी धूल कहाँ से आई है--?
अंजान पीड़ा से--
कलेजा माँ का
छलनी हो रहा था
चिड़िया का मुख पीला
बदन मलिन हो रहा था।
पानी को सिर से पाँव
तक फैला रही है
दामन में लगे दागों को
छुड़ा रही है।
दाग इतने पक्के और गहरे थे
पर कटे पंछी की तरह
खून से लथपथ
छटपटा रही है।
पानी के बहाव से
दामन के दागों को
यहाँ-वहाँ फैला रही है।
समाज की इस बदनसीब
विडंबना पर रोते-रोते
विषाद में मुस्कुरा रही है।
चिड़िया नहा रही है---।
