STORYMIRROR

Amit Kumar

Abstract Tragedy

4  

Amit Kumar

Abstract Tragedy

इंसान कहीं खो गया है.....

इंसान कहीं खो गया है.....

1 min
458

दुनिया का दस्तूर निराला है

हर कोई मुहब्बत करने वाला है

कुछ लोग बहक जाते है

कच्चे लालच को आधार मानकर

और उसी से इस दुनिया का

हर अंदाज़ बदलने वाला है

कहने को धर्म समाज जात-पात

भाषा-भाषी आदि का अनादि झगड़ा है

लेकिन जहां मतलब सिद्ध हो सकता है

वहाँ इंसान की इंसानियत का भंगड़ा है

कहने को हम इंसान है

सच कहूं तो सिर्फ कहने को

अब हमसे जानवर भी ज़्यादा

इंसानियत रखते है वो बेचारे मूक बधिर

न कुछ कहते न कुछ सुनते है

फिर इंसान को देखो अपना ठीकरा

उनके ही सर फोड़ डाला है

अब नहीं कोई अपना पराया

सब सपनों की बातें है

झूठे और मक्कार इस आदमी ने

सिर्फ खोखले ज्ञान के पर्चे बाटें है

आवारा है या बंजारा है या दीवाना हो गया

जाने कितने युग बीते है

इंसान कहीं पर खो गया है

इंसान कहीं पर खो गया है.......

       


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract