नारी की व्यथा
नारी की व्यथा
सदियों से नारी प्रताड़ित रही
लॉंछित अपमानित होती रही,
शैक्षिक, आर्थिक, सामाजिक
राजनीतिक अधिकारशून्य रही।
कन्यादान कन्या के प्रति अन्याय
अपने घर से उखाड़ दी जाती है,
उसका बचपन पीछे छूट जाता है
उस घर में लौटकर आ नहीं सकती।
पति का घर भी उसका घर नहीं होता
वहॉं उसका कोई अधिकार नहीं होता,
पति जब चाहे उसकी ताड़ना कर देता है
वह कुछ प्रतिवाद भी नहीं कर सकती।
पति के पीछे जंगल जंगल घूमकर भी
उसको राजरानी बनने का अधिकार नहीं ,
पति उसे गर्भिणी अवस्था में भी त्याग दे
घर से बाहर कर जंगल का रास्ता दिखा दे।
पति की दिन रात सेवा कर भी त्यागी गई
यज्ञाग्नि में कूद प्राणों की आहुति देनी पड़ी ,
पति की परिचर्या कर चार पुत्रों की जननी बनी
फिर भी पति द्वारा चरित्र पर शंका की गई।
और पति आज्ञा से पुत्र द्वारा वध की गई।
यह कैसी संस्कृति है कि पति अपनी पत्नी को
पाषाणी बना देता है ज़रा से सन्देह पर ही,
पति को असीमित अधिकार और नारी पराधीन।
सदियों से नारी लॉंछित अपमानित होती आई
जूए में हारी गई, राजसभा में बरबस घसीटी गई,
उसकी ऑंखों पर पट्टी बॉंधकर पशु की तरह
घर की चहारदीवारी में बन्द कर उसे रखा गया।
नारी की निन्दा से ग्रन्थ के ग्रन्थ भरे पड़े हैं
उसके त्याग बलिदान सेवा का कोई अर्थ नहीं,
युग पलट गये नारी की स्थिति वहीं की वहीं है
कुछ एक अपवाद हैं,पर सामान्य नारी पीड़ित है।
अभी भी नारी दहेज के लिये जलाई जाती है
पुत्री पैदा करने पर पत्नी छोड़ दी जाती है,
नारी की विवशता व्यथा कथा का अन्त नहीं
इस अभागे देश में स्त्री का जन्म है दुर्भाग्यपूर्ण।
संयुक्त राष्ट्र की ताज़ा रिपोर्ट कहती है कि
पुरुषों की दक़ियानूसी सोच में बदलाव नहीं,
जो लैंगिक समानता को लेकर पूर्वाग्रहों से ग्रसित हैं
और मानते हैं कि पुरुष ज़्यादा काबिल होते हैं।
रिपोर्ट दर्शाती है कि २५ फ़ीसदी लोगों की नज़र में
पुरूषों का अपनी पत्नी को पीटना जायज़ है।
कोविद के समय महिलाओं को रोज़गार छोड़ना पड़ा
असमानता के खिलाफ प्रयासों को झटका लगा है।
