मुखौटों में छुपे चेहरे...
मुखौटों में छुपे चेहरे...
बड़े अजीब ढंग से 'अभिनय'
किया करते हैं वो लोग...
अपना 'मतलब निकल जाते ही'
बड़ी चालाकी से
अपना 'मुँह फेर लेते हैं'
वही लोग !
मसलन, वो आपके
'भूतपूर्व शिक्षार्थियों के
माता-पिता' भी हो सकते हैं,
जो अपने संतान के शिक्षाकाल में
(सिर्फ अपनी 'निजी ज़रूरत'
पूरी करने के लिए ही)
आपकी आवभगत करते
नहीं थकते थे,
मोबाइल फोन पर ही सही,
आपका हालचाल पुछते नहीं थकते थे...
वो आपसे कभी ऐसे लहज़े में
वार्तालाप किया करते थे
कि आपको भी (संभवतः)
'गलतफमी' हो ही जाती थी
कि आपसे ज़्यादा अपना
उनका 'और कोई नहीं'...
मगर, जनाब, ठहरिए !
तनिक सोचिए...
और समझ (भी) जाइए न !!
क्या अब (अपना मतलब
निकल जाने के बाद) भी
वो (तथाकथित मुखौटे पहने चेहरे)
आपकी ठीक 'पहले जैसी'
आवभगत किया करते हैं...?
क्या वो 'आपके लिए'
थोड़ा-सा मूल्यवान समय
निकाल पाने की
'सदिच्छा' रखते हैं...??
क्या वो लोग (अब भी) आपको
अपने पारिवारिक भोज-मेल-मिलाप और
खुशियों में 'शामिल' करते हैं...???
सबसे बड़ा और अहम 'सवाल' --
क्या वो लोग आपको
(वही पहले जैसा) 'तवज्जो'
दिया करते हैं...???
क्या वो लोग
आपकी 'गिनती'
अपनो में किया करते हैं...???
अगर इन सारे सवालों का
जवाब 'ना' में हो, तो
आपको ये 'कड़वा' सच
आत्थमंथन कर ही लेना चाहिए
कि वो मुखौटों में छुपे हुए
कुछ 'खुदगर्ज़ी' से भरे चेहरे थे...
आगे की सीख ले लें, जनाब !
सबसे मिलिए
यूँ 'औपचारिकता से'
कि उनसे मिलना था
आपकी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का
'महज़ एक हिस्सा'...
कहीं किसी मुखौटेधारी को
आपसे अभिनयात्मक ढंग से
मुलाक़ात करने का
कोई मौका ही 'न मिले'...!!!
