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Sugan Godha

Abstract Tragedy


4.9  

Sugan Godha

Abstract Tragedy


मत पूछ मैंने क्या -क्या खोया

मत पूछ मैंने क्या -क्या खोया

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पत्थर की राहों पर मिली ठोकरे, 

उन राहों पर लहू की बूँदों को खोया !

पलकों पर सजा कर सपनों को,

हर पल उन्हें आंसूओं से धोया !!

मत पूछ मैंने क्या - क्या खोया !

    

न पा सकी मैं खुद को ही,

पाने की चाहत बहुत रखी !

इस पाने की चाहत में मैंने,

अपनी ही आत्मा को खोया !!

मत पूछ मैंने क्या - क्या खोया !


सपनों को पूरा करने चली थी,

पाया एक नया मुक़ाम मैंने !

उन सपनों को पाने के लिए,

मैंने अपनों को भी खोया !!

मत पूछ मैंने क्या - क्या खोया !


ख़ुशियों को तो पाया नहीं,

उनका बस बोझ ही ढोया !

चाहत की ही तो चाहत थी,

मैंने तो चाहत को भी खोया !!

मत पूछ मैंने क्या - क्या खोया !


पायी चकाचौंध रोशनी भी मैंने,

जिस्मानी रौनक से वास्ता है सबको!

दुश्मन मेरा आईना भी तो बना अब,

मैंने तो अपनी सादगी को भी खोया !!

मत पूछ मैंने क्या - क्या खोया !


सितारों को पाने को चली थी,

जहाँ भी गयी वहाँ हैवान मिले !

सम्मान तो कहीं मिला ही नहीं,

जो था स्वाभिमान वो भी खोया !!

अब और न पूछ मैंने क्या क्या खोया ..!



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