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Sugan Godha

Abstract

4.9  

Sugan Godha

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अनसुनी आवाज

अनसुनी आवाज

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भर आती हैं गले तक, 

कोई रूखी सी आवाज ।

सिमट कर रह जाती हैं ,

ले सूखे अधरों की ओठ ।

ढूँढ कर राह नैनो से वो ,

धीरे-धीरे से बह जाती है ।

वो अनकही आवाज फिर ,

तन्हाई में घुल जाती हैं ।

सारे अरमानो की ये ,

कोई कहानी लिख जाती हैं ।

बहते पवन के झोंकों पर ,

कुछ तेरी और कुछ मेरी ।

कुछ अधूरी कुछ पूरी ,

भीनी ओस की बूँदों सी ।

अनकही रूखी आवाज ,

किसी शाख के पत्तों पर ,

दुबक कर सो जाती हैं ।


 


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