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Sugan Godha

Abstract Romance

4.9  

Sugan Godha

Abstract Romance

अधूरे ख्वाब

अधूरे ख्वाब

1 min
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मैं रातों में उठ-उठ के,

अधूरे ख्वाब बुनती हूँ !

अकेले ही मैं रोती और, 

अकेले मुस्कराती हूँ !


मैं जद्दोजहद में अक्सर, 

खुद से रूठ जाती हूँ !

मगर मुझको मनाने अब,

यहाँ कोई नहीं आता !


अंधेरी रात के छाये में, 

सिमट कर मान जाती हूँ !

अकेली रातों में उठ-उठ के, 

अधूरे ख्वाब बुनती हूँ !


तेरी यादों में लिपट कर,

जब ये रात ढलती हैं !

सुबह उठकर मैं फिर, 

रात का इंतजार करती हूँ !


अकेले ही मैं रोती और,

अकेले मुस्कराती हूँ !

मैं अंधेरी रातों से अक्सर,

तेरी अधूरी बात कहती हूँ !


तेरी बातों में खो कर,

मैं सारा अम्बर घूम आती हूँ !

वो तेरी बाते नशीली हैं,

मैं चक कर झूम जाती हूँ !


मैं रातों में उठ-उठ के, 

अधूरे ख्वाब बुनती हूँ ।


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