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Sugan Godha

Abstract


4.8  

Sugan Godha

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ये हवाएँ

ये हवाएँ

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गुमसुम सी ये हवाएँ ,

कुछ कह रहीं हैं मुझसे ।

हौले हौले से करीब आ के ,

सरगम सी बज रही आज ।

खामोश तन्हाई में घुल के ,

न जाने क्यूँ छेड़ रहीं मुझे ।

खो जाऊँ मैं भी मस्ती में,

साजिश कोई रच रही हैं ये ।

इन बहकी सी हवाओं में ,

पंछी बन उड़ जाऊँ मैं ।

पर्वतों को पार कर लूं ,

बादल को छोड़ आऊँ ।

महकी हवाओं संग आज ,

मैं खुशबु बन खो जाऊँ ।


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