मन के जीते जीत है
मन के जीते जीत है
मन के जीते जीत है मन के हारे हार
मन चाहे तो मिल जाए आँगन में हरिद्वार
क्यों चले बाज़ार में करने को चीत्कार
मन की बात जो मान गए हो जाए सब उपचार
बस मन की ही मानिए पथ दिखलाए सटीक
वापस लौट के आ जाए पथ से भटका पथिक
मस्तिष्क तो एक यंत्र है संतुलन है काम
निज स्वार्थ को छोड़कर दिखे ना कोई धाम
मन मनुज का बिम्ब है करता सीधी बात
घात किसी का ना सहे ना करने दे आघात
देखकर अपना लाभ सदा दिमाग को होता भ्रम
शत्रु से करे दोस्ती मित्र से करता दंभ
पर जो मन को भा गया कभी ना छोड़े साथ
फायदा और नुकसान में कभी ना डाले हाथ
मन को कर लो साफ तो देव हो जाए प्रसन्न
भोजन में फिर स्वाद हो सदा भरा रहे अन्न
काले मन का जीव कभी ना पावे प्रेम
सदा रहे सम्मान से वंचित उसका अहम
मन गहरे तालाब सा रहस्य रखे गंभीर
समय आने पर छोड़ दे कटु शब्दों के तीर।
