मज़दूर
मज़दूर
कभी सोचती हूँ कि ईश्वर ने
इन मजदूरों को किस मिट्टी से गढ़ा है..
समय के सितम सहते हुए भी
उफ़ नहीं करते... सिर्फ़ रोटी की
ख़ातिर छोड़कर अपने घर परिवार
शहर में बस गए
और शहर की चमक में भुला बैठे
अपने खेत खलिहान, घर, परिवार!
और एक दिन इस शहर ने इन्हे
इनकी औकात दिखा दी...
जिन बड़ी बड़ी इमारतों को बनाने में
दिन रात अपना पसीना बहाया था इन्होंने,
उन इमारतों में इनके सर छुपाने के लिए
जगह नहीं थी..
उस पर भी सरकार पर से इनका
भरोसा नहीं उठा
ये सरकार को माई बाप मानते रहे..
पेट की आग बहुत बुरी होती है साब
सब कुछ भुला देती है.!
पेट की भट्टी में जब रोटी जाती है
तो बिना ताड़ी पीए ही मज़दूर
इसकी खुमारी में खो जाता है!
उसे नहीं दिखता की वो बिस्तर पर है
या रेल की पटरी पर...!
कुछ सवाल.. सवाल ही बने रहते हैं..
जवाब तलाशने के कई साल बाद भी
इन सवालों में बदलाव नहीं आता
ये बात अक्सर हैरान कर देती है मुझे!
मीलों तक अपने बीबी बच्चों को साथ लिए
चिलचिलाती गर्मी में अपनों के भरोसे
पर चले जा रहे हैं ये
दूध मुँहा बच्चा जब भूख से बिलखता है तो
माँ अपने आँचल में छुपा लेती है..
पर कब तक बिना खाए पीए बच्चे की
भूख मिटाती..
उसकी छाती सूख चुकी थी.. भूखे प्यासे
धूप में चलते जितना भी दूध
उसके आँचल में था पिलाती रही..
बाद में उसकी छाती में बच्चे के दाँत
गड़कर घाव हो गए और बच्चे ने भूख से
उसके आँचल में दम तोड़ दिया
उन घाव पर तो पपड़ी पड़ गयी...
पर उसकी ममता का क्या.?
इस देश की सरकारी संपत्ति पर
इस देश के मजदूरों का भी
उतना ही हक़ है जितना आम नागरिकों का.!
