मजबूरी
मजबूरी
आती है गुब्बारे वाले बुढ़िया ।
जिसे देख बच्चे मचल जाते हैं ।।
पर बच्चों के माता-पिता डर से।
महामारी के कुछ नहीं खरीद पाते हैं ।।
मायूस सा चेहरा लेकर वो ।
आज भी बिना बेचे घर चली आयी ।।
कैसे भरेगी पेट अपना वो ।
चिंता की लकीरें मुख पर उभर आई ।।
खुला है बाज़ार आज अरसे से ।
शायद आज कुछ माल बिक जाए ।।
वो भरकर पानी-पूरी का खोमचा चला ।
की शायद आज बच्चों का पेट भर सके ।।
उम्मीद का दीया लेकर वो ।
सुबह से शाम तक बैठा रहा ।।
हाईजीन के नाम पर लेकिन ।
बहुत ही कम माल बिका ।।
नीम के नीचे बाल संवारा करता है वो।
पर अब उतने लोग नहीं आते हैं ।।
सेनेटाइजर , मास्क और बाकी सब कुछ ।
रखा है इसने भी पर लोग बड़े सलून में जाते हैं ।।
जाने कब ये दहशत कम होगी ।
जाने कब हमारा भी काम चलेगा ।।
आखिर कब तक ऊपर वाला ।
ऊपर बैठकर हमारी परीक्षा लेगा ।।
जाने कितने ही ऐसे आशियाने ।
इस माहौल ने है खराब किया ।।
कितनों को बीमारी ने उजाड़ा ।
कितनों को भूख ने बेहाल किया ।।
कर सकें कुछ इन लोगों के लिए तो ।
मानवता पर ये बड़ा उपकार होगा ।।
वो भी जी लेंगे अपनी जिंदगी ।
दुआओं से उनकी अपना उद्धार होगा ।।
