मीरा इक अद्भुत भक्ति
मीरा इक अद्भुत भक्ति
मीरा तुम भक्ति में डूबी कैसे,
क्या अपना लिया था तुम्हें एक ही बार में,
क्या नहीं थी तुम कभी इंतज़ार में !
क्या टूटा नहीं था विश्वास कभी भी,
क्या छूटा नहीं था साथ कहीं भी,
क्या तुम भी थी मेरे ही लोक की,
या उतरी थी उस ब्रह्म लोक से ही !
क्या थी तुम ? मैं ये सोचती हूँ,
मैं भी चाहती उसमें ही रमूं,
क्या नहीं थी तुम्हारी माँ आस में,
कैसे डूबी तुम इस रास में !
क्या सच में थी तुम आकांक्षाओं से परे,
तुम्हारे नेत्र न थे कभी अरमानों से भरे,
कैसे छूटा तुमसे यह संसार !
कैसे न फंसी तुम इस मायाजाल,
तुमने तो बदल ही दिया था काल,
जब समां गई तुम उस ग्वाल,
मीरा! तुम हो भक्ति का भाल !
तुम हो कल्पवृक्ष का वो डाल,
जो है इच्छा शक्ति की इक मिसाल,
तुम हो पराकाष्ठा उस असीम की,
जिसे हम कहते हैं चमत्कार ही !
