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Annapurna Mishra

Drama

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Annapurna Mishra

Drama

मीरा इक अद्भुत भक्ति

मीरा इक अद्भुत भक्ति

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मीरा तुम भक्ति में डूबी कैसे,

क्या अपना लिया था तुम्हें एक ही बार में,

क्या नहीं थी तुम कभी इंतज़ार में !


क्या टूटा नहीं था विश्वास कभी भी,

क्या छूटा नहीं था साथ कहीं भी,

क्या तुम भी थी मेरे ही लोक की,

या उतरी थी उस ब्रह्म लोक से ही !


क्या थी तुम ? मैं ये सोचती हूँ,

मैं भी चाहती उसमें ही रमूं,

क्या नहीं थी तुम्हारी माँ आस में,

कैसे डूबी तुम इस रास में !


क्या सच में थी तुम आकांक्षाओं से परे,

तुम्हारे नेत्र न थे कभी अरमानों से भरे,

कैसे छूटा तुमसे यह संसार !


कैसे न फंसी तुम इस मायाजाल,

तुमने तो बदल ही दिया था काल,

जब समां गई तुम उस ग्वाल,

मीरा! तुम हो भक्ति का भाल !


तुम हो कल्पवृक्ष का वो डाल,

जो है इच्छा शक्ति की इक मिसाल,

तुम हो पराकाष्ठा उस असीम की,

जिसे हम कहते हैं चमत्कार ही !


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