मील का पत्थर।
मील का पत्थर।
मैं कचरा नहीं जो हवा के रुख के साथ बिखरता चलूं इधर से उधर।
मैं तो हूं मील का एक पत्थर
जो दिखाता हूं सबको सबकी डगर।
मैं शांत खड़ा हूं, लेकिन सब बेचैन है।
भागते फिर रहे हैं इधर से उधर
लगता नहीं कि किसी के भी मन में चैन है।
मैं मील का पत्थर हूं फिर भी अपने कर्तव्य पथ से मैं डिगता नहीं।
मिलती है सबको सांत्वना, कितनी दूर है उनका लक्ष्य
यह सब वे जान पाते हैं मुझको देखकर ही।
मेरे साथी भी जहां है वहां स्थिर ही रहते हैं।
लेकिन सड़कों पर दौड़ने वाले लोग नजर हम पर ही रखते हैं।
मैं भी देखता हूं सबको अपने सामने से गुजरते हुए।
कुछ ऐसे हैं जो मुझे देख कर भी अनदेखा करते हैं।
कुछ ऐसे हैं जो सिर्फ मुझे और मेरे परिवार को देखते हुए ही यात्रा करते हैं।
मैं मील का पत्थर हूं खड़ा रहता हूं और रास्ते आगे जाते रहते हैं।
आत्मा सा ठहरा हुआ हूं मैं,
लोग मन बुद्धि की गति के जैसे मेरे सामने से निकल जाते हैं।
उनकी सतत और निरंतर गति से वह लक्ष्य पर पहुंचेंगे या रुक गए बीच रास्ते में ही।
मैं शरीर नहीं, जो डरूं, सोचूं या घबराकर भागूं।
मैं तो आत्मा हूं, निर्विकार और निरंतर एक जगह ही जम कर खड़ा हूं
मैं कोई चंचला चित्त नहीं, जो हर समय भागता ही रहा हूं।
