STORYMIRROR

Ranjeeta Dhyani

Classics

4  

Ranjeeta Dhyani

Classics

महफ़िल

महफ़िल

1 min
372

सजी हुई है महफ़िल यारों की

संग खंजर छुपाए बैठे हैं

नशा चढ़ा है अहम का इतना

मासूम, जाम बनाए बैठे हैं


आओ-आओ जल्दी आओ

सब हाल पूछने बैठे हैं

हैसियत के चर्चे करते

जैसे खिल्ली उड़ाए बैठे हैं


बहुत दिनों के बाद मिले हो

सब गले लगाए बैठे हैं

तरक्की पर शाबाशी देते

सिगार सुलगाए बैठे हैं


अब पहले जैसी बात कहां ?

सब चिंतित होकर बैठे हैं

दूसरों का मिलाप देखकर

वो भीतर कुढ़कर बैठे हैं


हमें किसी से, मतलब नहीं 

सब संन्यासी बनकर बैठे हैं

महफ़िल में आए ये लोग

यहां चटकारे लेने बैठे हैं।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Classics