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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Tragedy

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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Tragedy

महंगाई वृषभ सी

महंगाई वृषभ सी

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यह महंगाई वृषभ सी जीवन को तोड़ रही है ,

अपने पंजे गड़ा छाती में राह को मोड़ रही है ।


कंगाली में आटा गीला होना लोकोक्ति सिद्ध हो रही है ,

महंगाई गरीब को, चक्की के दो पाटों बीच पीस रही है ।


जीवन की जद्दोजहद में बची रहीं यह कसैली यादें ,

दिन दोगुने रात चौगुने फल फूल रहे हैं चुनावी वादे । 


बढ़ती महंगाई घटती कमाई ने रास्ते बीच खड़ा किया,

दे पटखनी चौराहे में देखो सामने से कैसा वार किया ?


आधार कार्ड भी गरीब के जीवन को आधार न दे सका,

विकसित होने से पहले जीवन ही जग से अवकाश ले चला ।


हम भी कम ढीठ नहीं स्टेमिना बढ़ा हर वार रोक लेंगे ,

धरती के लाल हैं, धरतीकूप खोद कूल पानी निकाल लेंगे ।


तू कर ले कितनी कोशिश कामयाब ना होगी महंगाई ,

डायन मुफ्तखोर मुंहलगी , गरीब की शामत, ए हरजाई।


कारण आपूर्ति कम खपत हो रही कुछ ज्यादा है ,

जा दूर हो नजरों से, तुझे तेज भगाने का हमारा वादा है ।


एक बार फिर मितव्ययी बनकर सांझे घर से हो मुकाबला,

संयुक्त परिवार की डाल नींव महंगाई का हो तबादला ।


एकाकी एकल देखकर बैल मूरख सी ये खेद रही ,

अपने दोनों पैर गड़ा छाती में देखो सीना भेद रही ।


महंगाई स्वचालित सीढ़ी से चढ़ कैसी रही इतरा ?

चढ़ते हुए गरीब को सीढ़ी पर देख कस रही है फिकरा ।


महंगाई बढ़ा सुरसा सा मुंह, द्रोपदी का चीर हुई है ,

धीरे-धीरे महंगाई में मिलावटी दूध नीर क्षीर हुयी है ।



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