महंगाई वृषभ सी
महंगाई वृषभ सी
यह महंगाई वृषभ सी जीवन को तोड़ रही है ,
अपने पंजे गड़ा छाती में राह को मोड़ रही है ।
कंगाली में आटा गीला होना लोकोक्ति सिद्ध हो रही है ,
महंगाई गरीब को, चक्की के दो पाटों बीच पीस रही है ।
जीवन की जद्दोजहद में बची रहीं यह कसैली यादें ,
दिन दोगुने रात चौगुने फल फूल रहे हैं चुनावी वादे ।
बढ़ती महंगाई घटती कमाई ने रास्ते बीच खड़ा किया,
दे पटखनी चौराहे में देखो सामने से कैसा वार किया ?
आधार कार्ड भी गरीब के जीवन को आधार न दे सका,
विकसित होने से पहले जीवन ही जग से अवकाश ले चला ।
हम भी कम ढीठ नहीं स्टेमिना बढ़ा हर वार रोक लेंगे ,
धरती के लाल हैं, धरतीकूप खोद कूल पानी निकाल लेंगे ।
तू कर ले कितनी कोशिश कामयाब ना होगी महंगाई ,
डायन मुफ्तखोर मुंहलगी , गरीब की शामत, ए हरजाई।
कारण आपूर्ति कम खपत हो रही कुछ ज्यादा है ,
जा दूर हो नजरों से, तुझे तेज भगाने का हमारा वादा है ।
एक बार फिर मितव्ययी बनकर सांझे घर से हो मुकाबला,
संयुक्त परिवार की डाल नींव महंगाई का हो तबादला ।
एकाकी एकल देखकर बैल मूरख सी ये खेद रही ,
अपने दोनों पैर गड़ा छाती में देखो सीना भेद रही ।
महंगाई स्वचालित सीढ़ी से चढ़ कैसी रही इतरा ?
चढ़ते हुए गरीब को सीढ़ी पर देख कस रही है फिकरा ।
महंगाई बढ़ा सुरसा सा मुंह, द्रोपदी का चीर हुई है ,
धीरे-धीरे महंगाई में मिलावटी दूध नीर क्षीर हुयी है ।
