मेरी वसीयत
मेरी वसीयत
एक दिन अचानक से
चली जाऊँगी मैं
दूर
बहुत दूर
और तुम कह सको अलविदा
ना दूँगी तुम्हें
इतनी सी भी फुर्सत
हाँ पर छोड़ जाऊँगी मैं
अपनी वसीयत
जिसमें वो तमाम तन्हा दिन
और उदास रातें
कर जाऊँगी नाम तुम्हारे
जो तुमने दी थी मुझे
ज़िन्दगी भर
उन्हें करीने से सम्भाल रखा है मैंने
उस पुराने मन के संदूक में ।
तुम्हें वो आँसू भी दे जाऊँगी
जो बहा नहीं पाई
जिन्हें भीतर ही भीतर
जमा लिया था मैंने
बर्फ़ की मानिन्द
उन सिलों पर ढूंढना तुम
अक्स मेरा
और रख देना सिरहाने
एक जलती हुई शमा
जो अब तक ना बह सके
उसे बहने देना
एक उफनती नदी की तरह
मुक्त कर देना मुझे
पर बंधना तुम भी नहीं।
उन ख्वाहिशों के पुलन्दे भी छोड़ जाऊँगी
जो चाहते थे साथ तुम्हारा
जो चाहते थे सिर्फ़ हाथ तुम्हारा
सब कुछ दिया तुमने
जो ज़रूरी है ज़िन्दगी के लिए
पर वो नहीं दे पाए
जो ज़रूरी था
जीने के लिए
उस जीने के अरमानों की
वो तिजोरी
तुम्हारे नाम कर जाऊँगी
अब तुम भी रहोगे ज़िन्दा
पर देखना ये है मुझे
क्या इस वसीयत को लेने के बाद भी
जी पाओगे तुम
यदि तुम जी पाए तो भी
और ना जी पाए तो भी
मुक्त हो जाऊँगी मैं
सदा सदा के लिए।

