STORYMIRROR

Dr Manisha Sharma

Romance Tragedy

4  

Dr Manisha Sharma

Romance Tragedy

मेरी वसीयत

मेरी वसीयत

1 min
367

एक दिन अचानक से

चली जाऊँगी मैं

दूर

बहुत दूर

और तुम कह सको अलविदा

ना दूँगी तुम्हें

इतनी सी भी फुर्सत

हाँ पर छोड़ जाऊँगी मैं

अपनी वसीयत

जिसमें वो तमाम तन्हा दिन

और उदास रातें

कर जाऊँगी नाम तुम्हारे

जो तुमने दी थी मुझे

ज़िन्दगी भर

उन्हें करीने से सम्भाल रखा है मैंने

उस पुराने मन के संदूक में ।

तुम्हें वो आँसू भी दे जाऊँगी

जो बहा नहीं पाई

जिन्हें भीतर ही भीतर

जमा लिया था मैंने 

बर्फ़ की मानिन्द

उन सिलों पर ढूंढना तुम 

अक्स मेरा 

और रख देना सिरहाने

एक जलती हुई शमा

जो अब तक ना बह सके

उसे बहने देना

एक उफनती नदी की तरह

मुक्त कर देना मुझे 

पर बंधना तुम भी नहीं।

उन ख्वाहिशों के पुलन्दे भी छोड़ जाऊँगी

जो चाहते थे साथ तुम्हारा

जो चाहते थे सिर्फ़ हाथ तुम्हारा

सब कुछ दिया तुमने 

जो ज़रूरी है ज़िन्दगी के लिए

पर वो नहीं दे पाए 

जो ज़रूरी था 

जीने के लिए

उस जीने के अरमानों की

वो तिजोरी 

तुम्हारे नाम कर जाऊँगी

अब तुम भी रहोगे ज़िन्दा

पर देखना ये है मुझे

क्या इस वसीयत को लेने के बाद भी

जी पाओगे तुम

यदि तुम जी पाए तो भी

और ना जी पाए तो भी

मुक्त हो जाऊँगी मैं

सदा सदा के लिए।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Romance