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ca. Ratan Kumar Agarwala

Tragedy

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ca. Ratan Kumar Agarwala

Tragedy

मेरा परिचय क्या दूँ

मेरा परिचय क्या दूँ

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क्या परिचय दूँ मेरा और कैसे दूँ?

मैं जिन्दा हूँ पर पँख कट चुके हैं मेरे,

कैसे उड़ सकूँ मैं उस खुले आसमान की ओर?

जिम्मेदारियों के बोझ तले दबा हुआ,

जिन्दा हूँ पर खुद के लिए वक़्त नहीं।

जीता हूँ बस औरों के लिए

और जब तक जिन्दा हूँ तब तक जीना है

इसी बोझ को ढोते हुए

जीना बन गया है एक मजबूरी।

और जब तक जिन्दा हूँ, नहीं मिल सकता मुझे

मेरे सपनों का सोपान, मेरे अरमानों का आसमान।

उड़ना चाहता हूँ खुले आसमान में

पर जकड़ा हूँ समाज की बेड़ियों में

रिश्तों की बंदिशों में,

जिम्मेदारियों की जंजीरों में

सबने मिलकर काट दिए मेरे पँख।

आसमान है सर के ऊपर

पर उसे छू नहीं सकता।

बस एक जिन्दा लाश बन कर रह गया हूँ

जिसके अरमानों का कोई मोल नहीं।

बस खुद को मार कर औरों के लिए जिन्दा हूँ

अब समझ लिया है मैंने कि अगर पाना है आसमान

तो मरना पड़ेगा मुझे औरों के लिए

जीना होगा खुद के लिए।

जब तक औरों के लिए जीता रहूँगा

मेरा आसमान मुझसे दूर रहेगा।

हाँ सही समझा आपने कि

जब तक मैं जिन्दा हूँ,

आसमान दूर है मुझसे

पर अब और नहीं,

मुझे जीना है अपने लिए

पाना है मेरा आसमान,

भरनी है मुझे एक उड़ान

अपने लिए, हाँ सिर्फ अपने लिए

औरों को भुलाकर,

सिर्फ अपने लिए।

पाना चाहता हूँ खोई हुई खुशियाँ

जीना चाहता हूँ अपने लिए।

हाँ अब मैं औरों के लिए मर चुका,

बस जिन्दा रहूँगा अब मैं मेरे लिए,

और पा जाऊँगा मेरा खोया आसमान।

और शायद तब मैं जान पाऊंगा ख़ुद को

और पा सकूँगा मेरा वजूद,

और शायद तब मैं आपको दे सकूँगा

मेरा कोई परिचय।

और कर सकूँगा

मेरे अंदर के अव्यक्त “मैं” को व्यक्त

और तब लिख सकूँगा मेरे परिचय के

कुछ चंद अल्फाज़।

 



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