मैं,तुम और चन्द्रमा
मैं,तुम और चन्द्रमा
मेरे लिए तुम सदा चन्द्रमा ही रही
उतनी ही दूर और बहुत पास
समय,समाज,और संस्कार ने ही
विस्तार दिया इस दूरी को ।
कहते हैं चन्द्रमा कर लेता है
अट्ठाइस दिन में पूरी एक परिक्रमा
उस धरा की जिसने उसे चाहा
युगों युगों से और चाहेगी उम्र भर
मेरे लिए तुम भी थीं बहुत दूर
और बहुत पास
तुम चाहे आओ अठाईस दिन में
या अठाईस युगों में
पाओगी मुझे उतना ही पास
जहां मैं सुन पाऊं तुम्हारी सांस ।
ब्रह्मांड में एक चांद ही दिख जाता है सम्पूर्ण
और दूसरा तुम्हारे होने का अहसास ।
अमावस जब डुबो देता है उस
पूर्ण चंद्र को अपनी अटल गहराई में,
तब केवल तुम ही रह जाती हो
मेरे अस्तित्व में गुंथी हुई
चेतना के साथ
जिसे ही शायद कहते होंगे
आत्मसाक्षात्कार !!

