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Kusum Joshi

Abstract

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Kusum Joshi

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मैं रोऊंगी नहीं

मैं रोऊंगी नहीं

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कब तक यूं बैठकर,

कि क़िस्मत को कोसकर,

रो-रो के सुबक कर कभी,

कि शर्म-हया ओढ़कर,


कब तक चुपचाप सी,

सहमी निष्पाप सी,

संकोच में चलती हुई,

पहचान खोजती हुई,


हाड़ और मांस से,

कब तक बंधी रहूँ,

अंग-अंग की कुढ़न,

चुप हो के क्यों सहती रहूँ,


बस लिंग-जननांगों से,

भेद ऐसा क्या हुआ,

कि वक्ष के उभार ने,

क्या पाप कलंकित किया,


जन्म-जन्म की प्रथा,

ये धारणा क्यों बन गयी,

ये यौवन-अंग-रूप-रंग,

प्रताड़ना क्यों बन गयी,


कि नोंच-नोंच कर मुझे,

क्या मिली खुशी तुझे,

इस वक्ष के अंदर कहीं कि,

मन भी मेरा देख ले,


भेद तुझको क्या मिलेगा,

आत्मा के रूप में,

फ़िर खुशी क्यों मिल रही,

की अस्मिता की लूट में,


जिस वक्ष को तू नोंचता,

उस वक्ष ने जीवन दिया,

जिस अंग से यूं खेलता,

कि जन्म वहीं से लिया,


फिर क्यों इतनी क्रूरता,

कि पाप मैंने क्या किया,

ये किस तरह की खुशी है कि,

दया-धर्म भूलता,


कि कब तक मैं चीख़-चीख़,

ये प्रार्थना करती रहूँ,

ना देखो मेरे अंग बस,

कि याचना करती रहूँ,


मैं भी तो इंसान हूँ,

कि तेरे ही समान हूँ,

तू तो निडर घूमता,

फ़िर मैं क्यों इस डर में जियूं,


मैं ना ही कोई दास तेरी,

ना कोई गुलाम हूँ,

आत्ममनन कर ज़रा,

मैं रूप भगवान हूँ,


मैं ही हूँ सृजन धरा पे,

मैं ही जन्मदायिनी,

मैं वात्सल्य से भरी हूँ,

मैं प्रेम की प्रदायिनी,


अब नहीं मैं सह सकूंगी,

तेरे इस अन्याय को,

मैं ख़ुद करूंगी अंत तेरा,

ना तकूँगी न्याय को,


मेरे अंग देख-नोंच,

अधिकार तुझको ना दिया,

मैं क्यों बैठी रोती रहूँ,

अपराध मैंने क्या किया,


कि तेरी कुलिष सोच से,

मैं जीना छोड़ूंगी नहीं,

ऐ समाज तेरे खोखले नियम,

आज तोड़ूंगी सभी।।


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