STORYMIRROR

गीतेय जय

Abstract Inspirational

3  

गीतेय जय

Abstract Inspirational

आक्रोश

आक्रोश

1 min
204

पर्वतों के आँगन से

निष्कासित

नदिया की धारा

शिखरों से टकराने

फिर चल पड़ेगी

आक्रोश में उठकर...!!


अलंघ्य, अजेय, अडिग,

अचल, विशाल पर्वत

अनभिज्ञ प्रारब्ध से,

समय सरिता में प्रवाहित

कण कण बिखरेगा

जलधि तट पर ...!!


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract