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S Ram Verma

Abstract

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S Ram Verma

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जिन्दगी की भागमभाग

जिन्दगी की भागमभाग

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432


जिन्दगी की इस भागमभाग 

में अब तक भाग ही रहे हो तुम।

 

इसलिए तो कभी समझ ही नहीं पाए 

मेरी उर्वर आँखों की नीरवता में बसा 

जो स्नेह है एक सिर्फ तुम्हारे लिए 

मेरे कोमल मन में जो प्यार है।

 

वो एक सिर्फ है तुम्हारे लिए है 

मेरे स्पर्श में जो गर्माहट है 

वो भी है एक सिर्फ तुम्हारे लिए है 

मेरे इन अहसासों में जो नर्मी है 

वो भी तो एक सिर्फ तुम्हारे लिए है।

 

जिन्दगी की इस भागमभाग में 

कभी महसूस ही ना कर पाए तुम 

उन फूलों की खुशबू जो दबे रह 

गए हैं कहीं मेरे दिल के वर्क में।

 

जिन्दगी की इस भागमभाग में 

तुम कभी जान ही नहीं पाए मेरी 

उन अनकही बातों के अद्भुत अर्थ को 

तभी तो अब तलक खुद को मेरे 

पास ही नहीं ला पाए हो तुम।

 

जिन्दगी की इस भागमभाग में

अब तक भाग ही रहे हो तुम 

इस भागमभाग में क्या क्या खोया है 

तुमने ये अब तक जान ही नहीं पाए हो तुम !


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