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Kavi Yash kumar

Abstract

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Kavi Yash kumar

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फिर से

फिर से

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फिर से खुल गयी मेरी आँख

फिर से टूट गया एक सपना,

सो कर जाग उठा हूँ फिर से

फिर से वही सूर्य का उगना ।


अलाप रहे है फिर से पंछी

फिर से एक नये दिन के राग,

उड़ गए पंछी दाना चुगने

फिर से अपने नीड को त्याग ।


फिर से पीकर चाय सुबह की

बैठा हूँ फिर से कुछ लिखने नया,

डूबा हूँ फिर से सोच के सागर मे

फिर से सबक एक सीखने नया ।


फिर से कुछ लिख रहा हूँ,

मन ही मन कुछ रच रहा हूँ,

फिर से दूसरों को मान गलत मैं

गलतियों से अपने बच रहा हूँ ।


कल भी मै वैसा था

आज भी वैसा हूँ,

हँस रहा हूँ हर हालात मे

ना पूछो कैसा हूँ?


फिर से वही लोग है

फिर से वही अंदाज़,

कल भी मैं ना बदला

ना बदल सका हूँ आज ।


लौट रहीं है घर को चिड़ियाँ

मधुर गीत कोई गाते हुई,

ढलने वाला है सूर्य जल्द ही

फिर से दिखी संध्या आते हुई ।


फिर से सूर्य ढलने लगा

फिर से छाने लगा अंधेरा,

आज फिर से डाला मेघों ने

चाँद के घर पर डेरा ।


चंदा घिर गया मेघों से

फिर से काली घटायें छाई है,

चहल-पहल अब ख़त्म हुई

फिर से रात होने को आई है ।


फिर से हो गयी रात

फिर से लेट गया हूँ बिस्तर पर,

फिर से निंद्रा का नयनों मे आना

सो जाना फिर सपनो मे खो कर ।


फिर से एक नया दिन

फिर से वही दुनिया का खेल,

कुछ वक़्त गुज़ार लूँ सपनो मे

फिर सुबह दुनिया का जेल ।


फिर से सो रहा हूँ

सवेरे फिर से जागूँगा,

फिर से होगी भाग -दौड़

फिर से काम-धंधे पर भागूँगा ।



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