STORYMIRROR

Navneet Gupta

Horror Tragedy Classics

4  

Navneet Gupta

Horror Tragedy Classics

मारे ना होते ?

मारे ना होते ?

1 min
343

आज दो साल बाद भी

तुम्हारी कुछ यातनायें याद रह गयीं

सदियों तक शायद ऐसे ही डरायेंगीं

जब तक मानवहिलेगा डुलेगा


बेशक कुछ यादगार भी था

मानवीय जीवन हज़ारों साल पहिले की

दिनचर्याओं में आ गया था

निर्जन दीखते शहर

आत्मनिर्भर व्यक्ति

कार्बन फ्री आकाश-अच्छा नीला

सड़कें ख़ाली ख़ाली- सुनसान

कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी

वैसे पलों की


अनायास वो घटता गया

घटने के लिये

सारे संसार में

बहुतों के बहुत गये॥

बहुतों के कुछ

पर डरा सब को गये॥

कुछ ने आपदा में अवसर निकाला

कई ने अवसर आपदा में जानें भी दी॥


अब मत आना तुम

यूँ तो तुम घर देख गये हो

फिर भी बख्सना मानव को

वो तुम्हारा काम खुद ही करता है

कितने ही कितनों को खा जाते हैं

अन्जाने जाने॥

हे कोरोना !


સામગ્રીને રેટ આપો
લોગિન

Similar hindi poem from Horror