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AMAN SINHA

Tragedy Action

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AMAN SINHA

Tragedy Action

मानसिक रोग़

मानसिक रोग़

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अक्सर मैंने देखा उसको खुद से ही बातें करते

कभी-कभी बिना कारण ही खुद में हंसते खुद में रोते

कई दफा तो काटी उसने रातें यूं ही जाग जाग के

कभी किसी पर अटक गई जो पलकें उसकी बिना झपके

      

      बैठे-बैठे खो जाती है वो अपनी अंजानी दुनिया में

      कितने भाव उभर आते हैं उसकी थकीं आँख की डिबिया में

      कोई उसको ताड़ रहा है, क्यों ऐसा उसको लगता है

      कानों में कुछ बोल गया क्या, जब कोई निकट से जाता है

      

            अपनी ही परछाई उसको किसी और की आभा लगती है

            कभी कहीं दर्पण जो देखे किसी और की छाया दिखती है

            लगता हैं कोई बहुत दूर से उसका नाम पुकार रहा

            झौंका बनकर कोई हमेशा, उसके तन को सहला रहा


                  सच से भागे अँधियारे में, तो सच को वो पाये कैसे

                  अपने भ्रम में वो घुट-घुट कर खुद को फिर बचाए कैसे

                  रोग लगा ये मन को कैसे, अब तक उसको ज्ञान नहीं

                  किसने उसकी तंद्रा तोड़ी , कुछ भी उसको ध्यान नहीं।


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