मां दुर्गा का विजय गीत
मां दुर्गा का विजय गीत
मां दुर्गा का विजय गीत
जब भी आती मां दुर्गा, संतान सुखदायी,
क्रोध में भी ममता उनकी, शक्ति अपार छायी।
अंधकार जब बढ़ता जग में, पाप बढ़े जब भारी, असुरों का जब नाश हो आवश्यक, तब मां ने ललकारि।
महिषासुर था बल में गुमान, भटकी थी उसकी मति,
भूल गया वह प्रेम, दया, करुणा की सच्ची गति।
देवगण व्याकुल, व्यथित हृदय, जब मां को शीश नवाए,
तब दिव्य शक्ति जाग उठी, नौ रूपों में सजी आई।
त्रिशूल उठाकर हुंकार भरी, चंडी का रूप लिया,
आकाश कांप उठा, भय से असुरों ने रूप बदल लिया।
शेर की पीठ सवार हुई, रणभूमि में गर्जना आई,
एक-एक कर असुर दल को, चरणों में मां ने हराई।
रक्तबीज की माया भारी, गिरा तो सौ में बदल गया,
पर मां के क्रोध में थी ज्वाला, जिससे अंत अटल गया।
चक्र, गदा, खड्ग से मां ने, तम का साया दूर किया,
संहार कर अधर्म का, फिर धर्म का नूर दिया।
दुर्गा मां का विजय सदा, सत्य का जयगान है,
संघर्ष से जो ना डरे, वही सच्चा इंसान है।
जब-जब संकट आएगा, जब-जब पाप बढ़ेगा,
मां का आशीर्वाद हमें, फिर से रक्षा देगा।
हर शत्रु, हर संकट को, हम मां की शक्ति से हराएंगे,
मां की भक्ति में लीन रहकर, इस धरती को स्वर्ग बनाएंगे।
जय मां दुर्गा, जय मां जगदम्बा।।
तुम्हे सत सत नमन हैं मेरा।।
