STORYMIRROR

Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Tragedy

4  

Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Tragedy

आदर्श

आदर्श

1 min
279

आदर्श रिश्ता धीरे धीरे

खत्म हो रहा था

मुझे पता भी था

मगर अजीब था मेरा आशावाद

नया कोई आदर्श रिश्ता मिल जाएगा


काश! रिश्ता बचा लिया होता

आदर्श वही बन जाता

बना बनाया कोई आदर्श नहीं मिलता

यह उसी रिश्ते के रहते मैं समझ पाता


अब ना मेरा वह रिश्ता रहा

ना कोई मुझे आदर्श मिला 

ठोकर खा के गिरने से सिर्फ

आहत स्वाभिमान मेरा बचा।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy