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शायर देव मेहरानियां

Tragedy

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शायर देव मेहरानियां

Tragedy

ना हिन्दू मरता है ,ना मुसलमान

ना हिन्दू मरता है ,ना मुसलमान

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ना हिन्दू,ना मुसलमान मरता है 

जब भी मरता है, इन्सान मरता है 

दिल दहला देती हैं, तेरी ये नापाक हसरतें 

कत्ल इंसानियत का तू ,सरेआम ,करता है 

देखकर, 'जहाँ ए मंजर'लहू का ,

वो परवर दीगार ,भी बहुत डरता है 

सुला के मौत के आगोश में, अपनो को ही 

चेन-सुकून की, तू आहें भरता है 

सोच ,तुझे क्या हासिल होगा 

अनीति की ,राह पे, क्यों कदम धरता है 

कुछ तो शरम-हया ,कर ऐ बेदर्द !

लेके ,कुर्बानियाँ, तू अन्जान बनता है 

तू भी तो नेक बन्दा है ,उस परवर दीगार का

फिर क्यों हैवानियत का ,ये नाच नचता है 

ऐ ! मेरे मौला ,रहमत दे इन्हें

फरियाद ये 'देव' सुबह-शाम करता है!


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