" लड़खड़ाते हैं सभी "
" लड़खड़ाते हैं सभी "
गीत
है धरा जब कांपती तो,
लड़खड़ाते हैं सभी !
देखते विध्वंस हैं तो,
थरथराते है सभी !!
नींद में अकसर डराते,
आजकल ये जलजले !
जिंदगी चकराए पल में,
बढ़ चले तब मुश्किलें !
मंजिलें, मीनार ढहती,
चीखती गूंजें तभी !!
छेड़ हमने की प्रकृति से,
बंधनों में बांध कर !
है धरा को भी खंगाला,
बोझ डाला लाद कर !
उत्खनन कैसे रुकेगा,
है नहीं सोचा कभी !!
काट गिरि ओ जंगलों को,
हम वहां हैं जा बसे !
तप्त भी प्यासी धरा भी,
अब भला कैसे हंसे !
दोष अपने कौन गिनता,
ठहर कर देखो अभी !!
आज मौतें गिन रही है,
अब यही दुनिया अहो !
कर्म फल जो भोगना है,
पीढ़ियां भुगते कहो !
मिल धरा को सब सजाओ,
हों सुहाने दिन तभी !!
