लैला मजनू
लैला मजनू
अमर गाथा प्रेम की
एक थी लैला
शहजादी बगदाद की
खलीफा की लाडली
पली ऐशो आराम में
हर ख्वाहिश को रखती मुट्ठी में
क्या नामुमकिन
खलीफा की प्यारी शहजादी को
एक था मजनूँ
अनाथ और असहाय
पा गया पनाह
खलीफा के महल में
दास कहो या गुलाम
काम देखता महल के
यही जिंदगी गरीब की
मजनूँ ने न देखा कभी
अक्स लैला का
लैला बाहर निकलती पर्दे में
हरम से बाहर मजनूँ
चेहरा देखना शहजादी का
नामुमकिन था गुलाम को
है संभव मजनूँ को जानती लैला
नकाब लगा चेहरे पर
महिला देख लेती
रहस्य तथ्य
न प्रमाण कोई
मजनूँ सुनाता गीत
हसीन मल्लिका का
दिल की गहराई से
कोई हुस्न परी
आ जाती युवक के ख्वाब में
कल्पना, भ्रम या सत्य कोई
सुन लिया गान खलीफा ने
यों ही अनायास
यह क्या?
पीठ पर छुरा भोंक रहा
नीच गुलाम
शहजादी लैला को
देखा है धोखे से
उसी को सुनाता
न संदेह कोई
खलीफा की मान
शहजादी लैला की खबर
क्यों फैलें जग में
समय अलग था
मजनूँ हो गया कुर्बान
इश्क में लैला के
देखा नहीं कभी जिसको
जन्म से आज तक
लैला चली बाहर
कुछ झूठ बोलकर
कब्र पर जूते मारेगी
फरेबी धूर्त की
शहजादी को देखा धोखे से जिसने
जुर्रत देखो
इश्क की बात फैलाता
मजनूँ धूर्त था
अनेकों दासियां साथ थीं
सैनिकों की कतार
खुद खलीफा आ पहुंचे
दृश्य होगा
शहजादी लैला की जूतियां
पूजेगी फरेबी की कब्र को
कुछ दूर तज सभी को
अकेली लैला मजनूँ की कब्र पर
हाथ उठाती इबादत की भांति
कहती अलग बात
" हे खुदा, परवरदिगार
सत्य महबूब मजनूँ
लैला सेविका मजनूँ की
न इस जन्म की
साथ जन्म जन्म का
कब्र दे पनाह
इश्क में फना
लैला को खुद में
यही परीक्षा प्रीति की"
फट गयी कब्र
लैला समा गयी चुपचाप
ज्यों समायीं भूमि में
शक्ति राम की मां जानकी
इश्क में हुए फना
कब मरे दो प्रेमी
आज भी जिंदा
इश्क की खुशबू फैला रहे
कहाँ झूठ इसमें।

