STORYMIRROR

Pradeepti Sharma

Tragedy Others

2  

Pradeepti Sharma

Tragedy Others

लावा

लावा

1 min
138

सुलगती है जो भीतर, 

सर सर करती पल पल, 

पिघलता है एक एक कतरा, 

इस कदर एक अनकही पीड़ा में, 

मानो जैसे कोई लावा सा बहता हो



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy