STORYMIRROR

Pradeepti Sharma

Others

2  

Pradeepti Sharma

Others

वक़्त

वक़्त

1 min
86

वक़्त पानी सा बहता गया,

जीवन की नाव चलती गयी,

कई छोर छूटते गए,

किनारे भी धुंधले होते गए,

और अब ये मंज़र है,

कि गहराई रास आने लगी है,

अब ना किसी छोर की तमन्ना,

ना ही किसी किनारे की आस बची है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन