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Rajeev Rawat

Tragedy

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Rajeev Rawat

Tragedy

लाल रंग--दो शब्द

लाल रंग--दो शब्द

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देख मालिक तेरी धरती का

क्या से क्या अब हाल हो गया--

रक्तिंम छींटे उड़े तनों से

आकाश भी लाल हो गया--


कहीं देखो सिंदूर है रोता

कहीं आंचल के धागे रोते-

कहीं बिखरें है तागे राखी के

कहीं पिता के आंसू सूखे--


कितने बिक गये बाग बगीचे

कहीं फटी चादर भी रोती-

कहीं दानवी अट्टहास गूंजता

कहीं मानवता भी सोती-


कहीं लूटते निश्तेज शवों को

कहीं लूट - कालाबाजारी - 

कहीं नेताओं के खोखले वादे

कहीं पिसती जनता बेचारी - 


चारों ओर तबाही का मंजर

आदमी अब बेहाल हो गया-

रक्तिंम छींटे उड़े तनों से

आकाश भी लाल हो गया--


सूनी हो गये दिन और रातें-

छूट गये सब रिश्ते - नाते-

टूट गयी दीवारें अपनों की-

हालत बुरी बिखरे सपनो की-


न कोई अब कश्में वायदे 

न ही अपनों के कांधे है-

भाई बंधू और सारे नाते, 

अब रह गये आधे आधे हैं


अब तो कुछ गिद्ध बन गये

छोड़ मानवता इंसानों में-

कितनी क्षुधा बुझा पाओगे

तड़फते-मरते बेजानों में-


ये तो सुरसा सा मुंह फैलाये

अवितरित कहां से काल हो गया-

रक्तिंम छींटे उड़े तनों से

आकाश भी लाल हो गया--


अब किसको क्या हाल बतायें, 

रोज जलती हैं चिताएं-

जगह नहीं अब वाकी रह गयी, 

कहां कहां किसको दफनायें-


नाक-मुंह सब बंद किये हैं 

प्रदूषित हो गयी हवायें-

गोदामों में जाकर छिप गयी, 

जीवन रक्षक सारी दवायें-


सब डर कर सहमे से घरों मे

मिलने का तो अकाल हो गया-

रक्तिंम छींटे उड़े तनों से

आकाश भी लाल हो गया--



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