लाल रंग--दो शब्द
लाल रंग--दो शब्द
देख मालिक तेरी धरती का
क्या से क्या अब हाल हो गया--
रक्तिंम छींटे उड़े तनों से
आकाश भी लाल हो गया--
कहीं देखो सिंदूर है रोता
कहीं आंचल के धागे रोते-
कहीं बिखरें है तागे राखी के
कहीं पिता के आंसू सूखे--
कितने बिक गये बाग बगीचे
कहीं फटी चादर भी रोती-
कहीं दानवी अट्टहास गूंजता
कहीं मानवता भी सोती-
कहीं लूटते निश्तेज शवों को
कहीं लूट - कालाबाजारी -
कहीं नेताओं के खोखले वादे
कहीं पिसती जनता बेचारी -
चारों ओर तबाही का मंजर
आदमी अब बेहाल हो गया-
रक्तिंम छींटे उड़े तनों से
आकाश भी लाल हो गया--
सूनी हो गये दिन और रातें-
छूट गये सब रिश्ते - नाते-
टूट गयी दीवारें अपनों की-
हालत बुरी बिखरे सपनो की-
न कोई अब कश्में वायदे
न ही अपनों के कांधे है-
भाई बंधू और सारे नाते,
अब रह गये आधे आधे हैं
अब तो कुछ गिद्ध बन गये
छोड़ मानवता इंसानों में-
कितनी क्षुधा बुझा पाओगे
तड़फते-मरते बेजानों में-
ये तो सुरसा सा मुंह फैलाये
अवितरित कहां से काल हो गया-
रक्तिंम छींटे उड़े तनों से
आकाश भी लाल हो गया--
अब किसको क्या हाल बतायें,
रोज जलती हैं चिताएं-
जगह नहीं अब वाकी रह गयी,
कहां कहां किसको दफनायें-
नाक-मुंह सब बंद किये हैं
प्रदूषित हो गयी हवायें-
गोदामों में जाकर छिप गयी,
जीवन रक्षक सारी दवायें-
सब डर कर सहमे से घरों मे
मिलने का तो अकाल हो गया-
रक्तिंम छींटे उड़े तनों से
आकाश भी लाल हो गया--
