क्या किसी ने सोचा है कभी
क्या किसी ने सोचा है कभी
पहली रात को नई दुल्हन के भीगे नैनों की कहानी का सार कौन जान पाया होगा..
पति की उन्माद भरी आह से ताल मिलाते अंतर्मन में बसे शख़्स की यादों का
बवंडर नवेली के दिल में शायद उठता होगा..
दैहिक अधिकार को समझते खुद को पति के आगे परोसते तन में सर उठाते
असंख्य स्पंदन पर मरहम मलते ख़ुमार कोई जगता भी होगा..
आगोश किसी और की और ख़याल किसी और का
टकराते उस एहसास की कशमकश में भिंगते बावली का ख़्वाबगाह पिघलता होगा..
पति के जिस्म की तपिश से प्रेमी की तुलना से उठता धुआँ
आँखों में भरते ही अश्कों के संग प्रेमी के स्पर्श की मोहर का मजमा उतरता होगा..
मिल न पाए अरमाँ भरे दो दिल उस मलाल के मारे
दुनियावी रवायतों के प्रति नफ़रत का शीशा गलता होगा..
सुबकते बहती रात के साथ प्रेमी संग बिताए हर लम्हों का कारवां
चलता होगा हर क्रिया के साथ यादों का आवरण उतरता होगा..
क्यूँ प्रेम की दुश्मन है दुनिया इस खयाल से बार बार
रिवाजों को तोड़ कर प्रेमी की पनाह में चले जाने को मन करता होगा..
चुटकी सिंदूर संग थोपे गए अनमने बंधन को
ताउम्र निभाने का ख़याल नखशिख लड़की को जलाता होगा..
कहती है बहुत सारी कहानियां लाल जोड़े में
पहली रात को नम आँखों से बिस्तर पर पड़ी लड़कियों की आँखें..
ऐसी कहानियां सुनने या कहने में बहुत कम दूल्हों ने समय गंवाया होगा,
जिस्म से परे मन की धरा को छूकर देखते तो पता चलता कि
ब्याहता ने अपने कितने अरमाँ को बलि चढ़ाया होगा..
दुनिया में बिना चाहत के भी बहुत सारे दांपत्य नभ जाते होंगे,
क्यूँकि लड़कीयों ने पिता की इज़्जत रखते खुद ज़हर पीया होगा..
