" कविता और प्रियतम "
" कविता और प्रियतम "
कोई बनती नहीं कविता ,
तुम्हारे दूर जाने से !
न जाओ भूल के मुझसे ,
किसी के और कहने से !!
तुम्हारे रूप से ही तो
बनीं है मेरी कविताएँ
तुम्हारी मुस्कुराहट से
सजी है मेरी आशाएँ
जरा तुम बोल देती हो
मधुर संगीत बनता है
अधर की भंगिमाओं से
नया एक ताल मिलता है
नयन को देखने से ही
मेरी कविता निखरती है
जो पलकों को गिरा दो तो
नयी कोई बात बनती है
अधूरी मेरी कविता है
बिना तेरे रूप यौवन से
तेरा ही साथ है सब कुछ
नहीं कुछ चाह जीवन से
कोई बनती नहीं कविता ,
तुम्हारे दूर जाने से !
न जाओ भूल के मुझसे ,
किसी के और कहने से !!

